वली तू कहे अगर यक वचन
रकीबां के दिल में कटारी लगे !

गुजरात दँगों की पृष्ठभूमि पर बनी, 2009 में आई फ़िल्म ‘फ़िराक़’ , जिसका निर्देशन नंदिता दास ने किया था, में एक दृश्य है जिसमें नसीरूद्दीन शाह बीच रास्ते में उतरकर वली का मज़ार तलाशते हैं। वली के मज़ार के 2002 के गुजरात दँगों में तहस नहस कर दिये जाने की इस घटना को वर्तमान के प्रसिद्ध कवि राजेश जोशी अपनी कविता में भी उकेरते हैं-

बात इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई के शुरूआती दिनों की है
जब बर्बरता और पागलपन का एक नया अध्याय शुरू हो रहा था
कई रियासतों और कई क़िस्म की सियासतों वाले एक मुल्क में
गुजरात नाम का एक सूबा था
जहाँ अपने हिन्दू होने के गर्व और मूर्खता में डूबे हुए क्रूर लोगों ने —
जो सूबे की सरकार और नरेन्द्र मोदी नामक उसके मुख्यमन्त्री के
पूरे संरक्षण में हज़ारों लोगों की हत्याएँ कर चुके थे
और बलात्कार की संख्याएँ जिनकी याददाश्त की सीमा पार कर चुकी थीं

— एक शायर जिसका नाम वली दकनी था का मज़ार तोड़ डाला !

वह हिन्दी-उर्दू की साझी विरासत का कवि था
जो लगभग चार सदी पहले हुआ था और प्यार से जिसे
बाबा आदम भी कहा जाता था।

हालाँकि इस कारनामे का एक दिलचस्प परिणाम सामने आया
कि वह कवि जो बरसों से चुपचाप अपनी मज़ार में सो रहा था
मज़ार से बाहर आ गया और हवा में फ़ैल गया !
इक्कीसवीं सदी के उस शुरूआती साल में एक दूसरे कवि ने
जो मज़ार को तोड़ने वालो के सख्त ख़िलाफ़ था
किसी तीसरे कवि से कहा कि
मैं दंगाइयों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ
कि उन्होंने वली की मज़ार की मिट्टी को
सारे मुल्क की मिट्टी, हवा और पानी का
हिस्सा बना दिया !

अपने हिन्दू होने के गर्व और मूर्खता में डूबे उन लोगों को
जब अपने इस कारनामे से भी सुकून नही मिला
तो उन्होंने रात-दिन मेहनत-मशक़्क़त करके
गेंदालाल पुरबिया या छज्जूलाल अढाऊ जैसे ही
किसी नाम का कोई एक कवि और उसकी कविताएँ ढूँढ़ निकलीं

और उन्होंने दावा किया कि वह वली दकनी से भी अगले वक़्त का कवि है
और छद्म धर्मनिरपेक्ष लोगों के चलते उसकी उपेक्षा की गई
वरना वह वली से पहले का और ज़्यादा बड़ा कवि था !
फिर उन लोगों ने जिनका ज़िक्र ऊपर कई बार किया जा चुका है
कोर्स की किताबों से वो सारे सबक़ जो वली दकनी के बारे में लिखे गए थे
चुन-चुनकर निकाल दिए ।

यह क़िस्सा क्योंकि इक्कीसवीं सदी की भी पहली दहाई के शुरूआती दिनों का है
इसलिए बहुत मुमकिन है कि कुछ बातें सिलसिलेवार न हों
फिर आदमी की याददाश्त की भी एक हद होती है !

और कई बातें इतनी तकलीफ़देह होती है कि उन्हें याद रखना
और दोहराना भी तकलीफ़देह होता है
इसलिए उन्हें यहाँ जान-बूझकर भी कुछ नामालूम-सी बातों को छोड़ दिया गया है
लेकिन एक बात जो बहुत अहम है और सौ टके सच है
उसका बयान कर देना मुनासिब होगा
कि वली की मज़ार को जिन लोगों ने नेस्तनाबूत किया
या यह कहना ज्यादा सही होगा कि करवाया
वे हमारी आपकी नसल के कोई साधारण लोग नहीं थे
वे कमाल के लोग थे
उनके सिर्फ़ शरीर ही शरीर थे
आत्माएँ उनके पास नहीं थीं
वे बिना आत्मा के शरीर का इस्तेमाल करना जानते थे
उस दौर के क़िस्सों में कहीं-कहीं इसका उल्लेख मिलता है
कि उनकी आत्माएँ उन लोगों के पास गिरवी रखी थी,
जो विचारों में बर्बरों को मात दे चुके थे
पर जो मसखरों की तरह दिखते थे
और अगर उनका बस चलता तो प्लास्टिक सर्जरी से
वे अपनी शक्लें हिटलर और मुसोलिनी की तरह बनवा लेते !

मुझे माफ़ करें मैं बार-बार बहक जाता हूँ
असल बात से भटक जाता हूं
मैं अच्छा क़िस्सागो नहीं हूं
पर अब वापस मुद्दे की बात पर आता हूं

कोर्स की किताबों से वली दकनी वाला सबक़
निकाल दिए जाने से भी जब उन्हें सुकून नहीं मिला
तो उन्होंने अपने पुरातत्वविदों और इतिहासकारों को तलब किया
और कहा कि कुछ करो, कुछ भी करो
पर ऐसा करो
कि इस वली नाम के शायर को
इतिहास से बाहर करो !

यक़ीन करें मुझे आपकी मसरूफ़ियतों का ख़्य़ाल है
इसलिए उस तवील वाकिए को मैं नहीं दोहराऊँगा
मुख़्तसर यह कि
एक दिन….!

ओह ! मेरा मतलब यह कि
इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई के शुरूआती दिनों में एक दिन
उन्होंने वली दकनी का हर निशान पूरी तरह मिटा दिया
मुहावरे में कहे तो कह सकते हैं
नामोनिशान मिटा दिया !

उन्ही दिनों की बात है कि एक दिन

जब वली दकनी की हर याद को मिटा दिए जाने का
उन्हें पूरा इत्मीनान हो चुका था
और वे पूरे सुकून से अपने-अपने बैठकखानों में बैठे थे
तभी उनकी छोटी-छोटी बेटियाँ उनके पास से गुज़री
गुनगुनाती हुई।

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ये वही वली दक्कनी हैं , जिन्हें ‘ उर्दू शाइरी का बाबा आदम ‘ भी कहा जाता है। जिस तरह अहमदाबाद की उस सड़क से वली का मज़ार गायब हो गया , ठीक वैसे ही उर्दू शाइरी में वली को हाशिये पर रख दिया गया है।
वली का पूरा नाम शाह वलीउल्लाह वली था। वली औरंगाबाद (दक्कन) के रहने वाले थे। वली को ‘वली गुजराती ‘ के नाम से भी जाना जाता है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार वली का सिलसिला कादरिया सूफ़ी सम्प्रदाय से मिलता है। वली का जन्म सन् 1767 ईस्वी में औरंगाबाद (दक्कन) में हुआ था।

गुजरात के फिराके सों है खा़र-खा़र दिल,
बेताब है सूने मन आतिल बहार दिल।

वली का बचपन औरंगाबाद में ही गुज़रा। 20 वर्ष की आयु में (कहीं -कहीं 16 या 18 की आयु में) वली दिल्ली आये। हालांकि इस तथ्य की पुष्टि में कोई ठोस दलील नहीं मिल पाती। किन्तु वली का एक शेर इसकी कुछ हद तक इस मामले में संशय दूर कर देता है।

दिल ‘वली’ का ले लिया दिल्ली ने छीन,
जा कहो कोई मुहम्मद शाह सूं.

उर्दू शाइरी के प्रसिद्द उस्ताद मुहम्मद हुसैन आज़ाद अपनी किताब आबे हयात में लिखते हैं कि,”वली पहला साहिब-ए-दीवान शाइर और शुमाली (दक्षिणी) हिन्दुस्तान का पहला उर्दू शाइर है।”
हालांकि आज़ाद की कही ये बात संदेह के घेरे में आ जाती है, क्योंकि कुली कुतुब शाह ( जिनकी मृत्यु के प्रमाण वली से सौ साल पहले मिलते हैं) की कुल्लियात (सम्पूर्ण काव्य संग्रह) भी देखी जा सकती है।
उर्दू शाइरी में वली ना केवल ऐतिहासिक स्थान रखते हैं, बल्कि वली अपनी शाइरी के क्षेत्र में भी लोहा मनवाते नज़र आते हैं। वली की शाइरी पढ़कर ऐसा लगता है कि जैसे शाइरी की परंपरा वली के ख़ानदान में बहुत पहले से चली आ रही है।

आज तेरी भवाँ ने मस्जिद में,
होश खोया है हर नमाज़ी का।

वली दक्कनी ने ग़ज़ल के साथ-साथ क़सीदा, रूबाई, क़तआ, मसनवी भी लिखी हैं, लेकिन जो प्रसिद्धि उन्हें ग़ज़ल के क्षेत्र में मिली, वो और किसी जगह नज़र नहीं पड़ती।
उर्दू ग़ज़ल को वली ने नई ऊंचाईयाँ दीं। वली उर्दू के पहले शाइर हैं, जिन्होनें ग़ज़ल को भारत के दक्षिणी हिस्से से निकाल कर सारे भारत के उससे अवगत कराया।

रियाज़ी फ़हम-ओ-गुलशन तब्‍अ-ओ-दाना दिल, अली फ़ितरत,
ज़बाँ तेरी फ़सीही-ओ-सुख़न तेरा ज़लाली है।

वली की शाइरी नें उनके समकालीनों को बहुत प्रभावित किया। ग़ज़ल में वली इतनी ख़ूबसूरती से छवियों का निर्माण करते हैं कि ग़ज़ल ख़ुद अपने मुँह से बोलती हुई नज़र आती है। वली की प्रसिद्धि का एक कारण ये भी है कि वली अपनी शाइरी में हिन्दी और फ़ारसी के शब्दों का भरपूर प्रयोग करते हैं, जो उन्हें अन्य भाषा वाले लोगों में भी लोकप्रिय बनाता है।

माह अंधकार था कि ज्‍यूँ मेरे,
पास मेरा जो माहताब न था।

आह पर आह खींचता था मैं,
आज की रात कुछ हिसाब न था।

वली की शाइरी में एक और नया पहलू नज़र आता है। वली हिन्दी शाइरी की परंपरा से प्रभावित थे। हिन्दी शाइरी की परंपरा में प्रेम का इज़हार स्री की ओर से होता है। वली भी इससे अछूते ना रहे।

परतखना जिन ने ली उसे घर बार करना क्या,
हुई जोगन जोगी पी के उसे संसार करना है।

वली की ग़ज़लों में कहीं-कहीं छंद-शास्त्रीय दोष मिलता है, किन्तु वली की ग़ज़लों की भाषा मनमोहक और आकर्षित करने वाली है। वली की ग़ज़लों में प्रेम भी है तो प्रेम का विरह भी।
वली की शाइरी में कल्पना की ऊंची उड़ान नज़र आती है। वली अपनी शाइरी में जिस प्रकार की तश्बीह का प्रयोग करते हैं, उससे शेर का सौन्दर्य निखर निखर आ जाता है।

हर ज़बान पर है मिस़्ल-ए-शाना-ए-मदाम,
ज़िक़्र तुझ ज़ुल्फ़ की दराज़ी का।

जीवन भर शाइरी को नये आयाम देने वाले वली दक्कनी सन् 1725 ईस्वी ( कुछ इतिहासकारों के अनुसार 1744 ईस्वी) में इस संसार को अलविदा कह गये।

सजन की ख़ुर्दसाली पर ख़ुदा नाज़िर ख़ुदा हाफ़िज़,
रक़ीबाँ की मलामत सूँ मुहम्‍मद मुस्‍तफ़ा हाफ़िज।

‘वली’ ग़मगीं न हो ये भेद असरार-ए-इलाही है,
कि तेरी दस्‍तगीरी पर निगाह-ए-दिलरुबा हाफ़िज़।

(यह आलेख ज़ुबैर आलम द्वारा लिखा गया है। लेखक वर्तमान में जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई दिल्ली में पत्रकारिता के छात्र हैं)