एक बार ग़ालिब के पास पैसों की बेहद कमी हो गयी। बीबी उमराव बेगम से माँग बैठे तो वो बोलीं – नमाज पढ़ो तो मुराद पूरी होगी। फिर क्या था, ग़ालिब गली कासिमजान, बल्लीमारान वाले अपने मकान से निकलकर सीधे जामा मस्जिद पहुँचे, वजू किया और सुन्नतें पढ़ने के लिए बैठ गए।

इधर ग़ालिब साहब मस्जिद पहुंचे उधर एक शागिर्द अपनी शायरी ठीक कराने उनके घर पहुंच गए। जब शागिर्द को पता चला की ग़ालिब साहब मस्जिद गए हैं तो उसने शराब की एक बोतल खरीदी और उसे कोट के भीतर छिपा कर वो भी मस्जिद पहुंच गया और ग़ालिब को देखते ही उन्हें आवाज़ देकर कोट की अंदर की जेब की ओर धीरे से इशारा किया।

अब क्या ! मियाँ ग़ालिब ने तुरंत अपनी जूतियां उठायी और चल पड़े। उनको निकलता देख एक पड़ोसी बोले- मियाँ ग़ालिब, जिंदगी में पहली बार तो आप मस्जिद में आए हैं, कम से कम फर्ज तो पढ़ लीजिये। ग़ालिब बोले- ‘हुज़ूर, अभी वाला काम तो सुन्नतों से ही हो गया, अब अल्लाह को और तंग करना मुनासिब नहीं।’