जब भारतीय उपमहाद्वीप ने आधुनिकता का नाम भी नही सुना था, तब उन्नीसवीं शताब्दी में ग़ालिब ने अपनी शायरी से आधुनिकता का अर्थ बताया। इक्कीसवीं शताब्दी में जब उत्तर आधुनिकता का ढ़ोल चंहुओर बज रहा था उससे बहुत पहले ही उन्नीसवीं सदी में ग़ालिब ने उत्तर आधुनिकता को समझा दिया था।

जहाँ मीर ने चाँद में एक अप्सरा का चेहरा देखा, वहीं ग़ालिब ने चाँदनी में दरिया में उठती हुई लहरों को देखा। एक शेर उसके संबंध में  –

मौज से पैदा हुए पैरहन दरिया में ख़ार,

गिरया, वहशत, बेक़रार-ए-जलवा-ए-माहताब था।

वर्तमान समय में यूँ तो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का संस्थापक सर सैय्यद अहमद खाँ को माना जाता है, मगर उसके पीछे ग़ालिब की आधुनिक और दूरदर्शी सोच भी शामिल थी। मुग़ल बादशाह अकबर के समय में अबुल फ़ज़ल ने आईने-अकबरी लिखी थी, जिसे सर सैय्यद अहमद खाँ ने दोबारा छापने का सोचा और इस पर सलाह के लिये वो ग़ालिब के पास आये। ग़ालिब ने उस पर कोई टिप्पणी किये बिना फ़ारसी में एक ग़ज़ल लिख कर उन्हें थमा दी। जिसकी अंतिम पंक्ति थी कि-

मुर्दा परवरदन मुबारक क़ार-ए-ज़ीस्त,

ख़ुद बगूँ नीज़ जुज़ गुफ़्तार-ए-ज़ीस्त।

(जो मुर्दा हैं उनकी तुम फ़िक़्र करते हो लेकिन जो आने वाली नस्लें हैं उनके बारे में कभी सोचा है।)

उन्नीसवीं सदी में ग़ालिब इस्लाम के क्रान्तिकारी के रूप में उभरकर सामने आते हैं। जब हिंदुस्तान में अंधविश्वास का दौर था, तब वो अकेले व्यक्ति दिखाई देते हैं जिसने एकेश्वरवाद को पकड़े रखा।

उसे कौन देख सकता कि यग़ाना है वो यक़्ता,

जो दुई की बू भी होती तो कहीं दो चार होता।

जब विज्ञान ने तरक़्क़ी की तो बीसवीं सदी में एक उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा गया, तो मुझे फिर से ग़ालिब याद आये और उनका वो शेर भी-

मंज़र एक बुलंदी पर और हम बना सकते,

अर्श से उधर होता काश के मकाँ अपना।

उत्तर आधुनिक युग में जब प्रख्यात आलोचक शब्दों की सौन्दर्यता की बात करते हैं, तो वही ग़ालिब उन्नीसवीं सदी में शब्दों की सौन्दर्यता के जन्मदाता नज़र आते हैं। उर्दू शाइरी को शाब्दिक सौन्दर्य की सौगात देने वाले ग़ालिब ही हैं। ग़ालिब ने ऐसे-ऐसे शब्द अपनी शाइरी में प्रयोग किये हैं कि पाठक अपना सर धुनने को मजबूर हो जाता है। उर्दू शायरी के हर दौर में शब्दों की भरमार रही लेकिन उन्हें क्रमबद्ध करने के मामले में ग़ालिब प्रवीण हैं।

अल्लाह रे! ज़ौक़-ए-दश्त-ए-नवर्दी कि बाद-ए-मर्ग,

हिलते हैं ख़ुद-बा-ख़ुद मेरे अंदर कफ़न के पाँव।

आज कि जब प्रगतिशीलता और उत्तर आधुनिकता का बोलबाला है, हम देखें तो उन्नीसवीं सदी के ग़ालिब दो सौ साल आगे नज़र आते हैं।

एक तरफ़ ना केवल ग़ालिब पुरातन साहित्य के पक्षधर नज़र आते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ ब्रिटेन में बने भाप के इंजन , (जो पानी के जहाज़ और  रेलगाड़ी को तेज़ गति प्रदान करता है) पर भी अपनी निगाह गढ़ाये रखते हैं। इस मामले में ग़ालिब का नज़रिया किसी वैज्ञानिक से कम नज़र नहीं आता। ग़ालिब के ना जाने कितने शेर आपको साइंस की दुनिया में हो रही हलचलों की तरफ़ इशारा करते नज़र आयेंगे।

सब्ज़ा-ओ-गुल कहाँ से आये हैं,

अब्र क्या चीज़ है, हवा क्या है।

क्या ये शेर आपको विज्ञान के नज़रिये से सोचने पर मजबूर नही करता?

ग़ालिब उपमहाद्वीप के पहले व्यक्ति हैं जो इस तरह सवाल करते हैं।

ग़ालिब उपमहादीप में भी रह कर ऊर्जा के संरक्षण ( conservation of energy) के बारे में बात करते हैं। ग़ालिब ने इस चीज़ को अपने एक शेर में प्रश्नवाचकता की दृष्टि से लिखा है

ज़ोफ़ से गिरया मुबद्दिल है बदम-ए-सर्द हवा,

बावर आया हमें पानी का हवा हो जाना।

ग़ालिब के इस शेर को ‘थ्योरी ऑफ़ कन्ज़र्वेशन ऑफ़ एनर्जी ‘ भी कहा जाता है।

आज के दौर में जो पश्चिमी संस्कृति सर चढ़ के बोल रही है, उसके बारे में ग़ालिब उस समय चेतावनी देते नज़र आते हैं-

ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र ,

काबा मिरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।

भले ही प्रगतिशील आंदोलन की शुरूआत बीसवीं सदी में हुई हो, मगर इस आंदोलन के जन्मदाता कहीं ना कहीं ग़ालिब है। दबीर-उल-मुल्क़, नज्मुद्दौला के नाम से जाने जाने वाले मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ ‘ग़ालिब’ उर्दू शाइरी के वो प्रमुख स्तम्भ हैं, जो कल भी आधुनिक थे और आज भी आधुनिक हैं।

( यह लेख ताबिश ग़ज़ाली के द्वारा लिखा गया है। लेखक वर्तमान में जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पत्रकारिता के छात्र हैं। यह लेख मूल रुप से उर्दू भाषा में है, जिसे नया सवेरा के लिए ज़ुबैर आलम ने अनुवादित किया है)