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फासीवादी विचारधारा की तारीख़ बताती है उसे सब से ज़्यादा नफ़रत सवालों से होती है। सवाल करना एक ऐसा मूल्य है जो किसी भी अराजक तत्व, संस्था, संगठन, विचारधारा, पंथ या प्रचालन को ज़्यादा देर तक हावी होने नहीं देती है।

सवाल इस बात का प्रमाण और प्रतीक है कि अगर उस का मूल्य है और उसे आज़ादी है तो संस्था, संस्कृति और संगठन सामाजिक मूल्यों का निर्वाहन कर सकती हैं लेकिन अगर कहीं सवाल कि गुंजाईश ख़त्म कर दी जाये तो यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि अराजकता, असमाजिकता और असमानता का प्रवेश हो चुका है। संवैधानिक और लोकतान्त्रिक मूल्यों को पूर्ण रूप से असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक करने की मुकम्मल तैयारी हो चुकी है।

सवालों का सब से बड़ा केंद्र यह शिक्षण संसथान हैं जहाँ पर धर्म, जाति, रंग, भाषा, समाज और संस्कृति से उठ कर सवाल करना सिखाया जाता है। हर वह ज्ञान अधूरा और कभी कभी हानिकारक है जिस के प्रयोग से मानविक और सामाजिक मूल्यों में बढ़ोतरी की कोशिश शामिल ना हो।
समय समय पर सवालों को इन्किलाबी होना पड़ता है। अराजकता और अलोकतन्त्र का अंधकार इस लिए फैलता है क्यूंकि समानता और संविधान की रौशनी मद्धिम पड़ने लगती है।

देश के मौजूदा हालात यह स्पष्ट करने के लिए काफ़ी हैं कि इस वक़्त सरकारी नफ़रत का सब से ज़्यादा शिकार देश के हर वह शिक्षण संस्थान हैं जिन्हों ने अपने सिधान्तों का सौदा नहीं किया है। सवाल उठाने की संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वाहन करना अपने शैक्षिक जीवन का एक अंग मात्र नहीं बल्कि जीवन शैली बना लिया है।

सरकारी मशीनरी द्वारा सिलेबस में बदलाव, इतिहास से छेड़ छाड़, शिक्षा के संवैधानिक अधिकारों का सरकारी दमन, शिक्षा में धर्म, जाति, पंथ, विचार, रंग, भाषा, जगह और कल्चर की अफ़ीम की मिलावट, शिक्षा का राजनैतिक कारोबार, शिक्षा में ज्ञान और खोज के विकास की जगह पंथ, परंपरा और समुदाय के चलन का विकसित होना देश और समाज के लिए घातक होता है।

जिस तरह से यूनिवर्सिटी कैंपसों में गुंडागर्दी की परिस्थितियां आये दिन उत्पन्न हो रही हैं वो देश को एक ऐसे अंधकार की दिशा में ले जा रही हैं जिन से बाहर निकलने में बरसों लगेंगे।

ऐसी परिस्थितियां अचानक नहीं आती और ना ही एक झटके में जाएँगी। किसी भी समाज में अराजक तत्वों की तादाद बहुत कम होती है लेकिन सभ्य और सेक्युलर समाज का अपने आपसी मुद्दों में उलझ कर इस और ध्यान ना देना अराजकता को फैलाते हैं।

अराजकता का ज़ख्म नासूर इस लिए बन जाता है क्यूंकि नासूर से पहले उसे किसी दूसरी नज़र से देखा जाता है। जाति, धर्म, पंथ, समुदाय, रंग, भाषा और जगह विशेष से जोड़ कर देखा जाता है इस लिए यह मुद्दा सामाजिक या सार्वजानिक नहीं लगता।

जेएनयू, जामिया, एएमयू, बीएचयू समेत देश के बहुतायत विश्वविध्यालय अराजकता के निशाने पर हैं।
यह धर्म, जाति, पंथ, समुदाय निरपेक्ष समाजी मसीहाओं के इम्तिहान का समय है। यदि अभी भी उन्हें लगता है कि पानी सर से ऊपर बहने के बाद भी तैर के बाहर आया जा सकता है तो यह उन की ग़लत फ़हमी है क्यूंकि तब तक हाथ पैर ठन्डे हो हुके होंगे।