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दिल्ली चुनाव हर रोज़ नए मुद्दों पर आकर्षित होता नज़र आ रहा है। इस से पहले किसी और चुनाव में गोलियों और गालियों का इस तरह सहारा नहीं लिया गया। इस को एक अलग द्रश्य से देखा जाये तो विश्व भर चुनावी अभियानों को एक तरफ रख दिया और भारत के चुनाव कैंपेन को एक तरफ तो भारत निर्विरोध विश्व गुरु बन जाता है क्यूंकि एक रात का फर्क़ होता है कि प्रचलित मुद्दे अपना रंग, रूप, तेवर और तापमान बदल लेते हैं। एक ही व्यक्ति को राष्ट्रवादी और राष्ट्र विरोधी साबित करने की क्षमता भारत की वर्तमान राजनीति के मुकाबले कहीं और देखने को नहीं मिल सकती।
दो तीन दशक पहले किसी ने नहीं सोचा था कि भारत की भावात्मक श्रधा और इमोशनल व्यवहार जिस की विश्व भर में ख्याति है और इसे गौरव की नज़र से देखा जाता रहा है, आज उस का राजनीतिकरण होगा और ऐसा होगा कि लोग भूख, रोज़गार, महंगाई, बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ और सुरक्षा के मूल मुद्दों से ख़ुशी से भटक जायेगे।

देश के साथ लगाव हर देश वासी के मन में ईमान और आस्था की की तरह बसता रहा है हाँ कभी उसे प्रमाणित करने की आवश्यकता महसूस नहीं की गयी। आवश्यकता अनुसार प्राणों की आहुति दे कर देश के गुलशन को आबाद रखने के सामूहिक प्रयास किये गए है और समान नहीं बलिदान भी दिए गए हैं। राष्ट्रवाद और देश भक्ति की कभी सामूहिक चर्चा भी नहीं हुई। उसे किसी खास कपड़े, नारे, भाषा, संस्कृति, क्षेत्र या समुदाय की नज़र से भी नहीं देखा गया।

यह पहली बार है जब अचानक से यह सवाल हुआ कि इस बात क्या प्रमाण है कि कोई देश भक्त है। यह तो स्वाभाविक है कि अभी तक जिस का आभास मात्र होता था अब आस्था को प्रमाणित करने के ढूंढने की आवश्यकता पड़ गयी।

बड़ी समस्या तो एक क़दम आगे खड़ी थी कि देश भक्ति का पैमाना क्या है। यह कौन तय करेगा कि इस की देश भक्ति सही है और इस की नहीं। क्यूंकि इस से पहले तो इस की न ज़रूरत पड़ी और न इस का कभी कोई वक्तव्य सामने आया। अब इस में भ्रष्टाचार और संवैधानिक मूल्यों के विपरीत जाती राजनीति शुरू होती है। हर वह आधार काट दिया जाता है जो प्रश्न करने वाले को पसंद नहीं क्यूंकि दुर्भाग्यवश प्रश्न करने वालों को ही तय करना है कि कौन देश भक्त है और कौन नहीं।

देश उस की सरहद और उस गर्व, गौरव और गरिमा के प्रति आस्था हर भारतीय के अन्दर उस की आत्मा की तरह बसते हैं देश के नाम मात्र से ही भारतीय किसी भी तरह के मतभेदों को भुला कर, वाय्कित्गत लाभ हानि की चिंता छोड़ कर देश हित की पंक्ति में क़तर बद्ध हो जाता है।

अब इस के नाम पर राजनीति ने भारत राजनीति को एक नया रूप दे दिया है। सत्ता ही को प्रमाणित करना है कि कौन देश भक्त है तो भला विपक्ष को देश भक्ति का सर्टिफिकेट क्यूँ देगा। देश का आम आदमी देश के नाम पर भला अपने रोटी, रोज़गार, स्वास्थ, शिक्षा और सम्मान की बात क्यूँ करेगा।

संविधान का मूल मुद्दे से बिलकुल ही भटक गए। आख़िरकार किसी भारतीय को किसी भी राजनैतिक पार्टी के पोलिटिकल फायदों के लिए अपनी देश भक्ति साबित करने की ज़रूरत ही क्या है। समस्त भारत का सम्पूर्ण सामाजिक मुद्दा कोई कोई नेता या मंत्री क्यूँ तय करेंगे। किसी भी भारतीय की भारतीयता संविधान से तय होगी किसी पार्टी या संगठन के व्यक्तिगत विचारों से।