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सत्ता जब घिरने लगती है तो वो नए नए मुद्दों या घिरते हुए मुद्दों से ध्यान भटकने के लिए प्रयास करने लगती है. इन सब में अक्सर सत्ता कामयाब भी होती गयी है. पिछले एक महीने की बात करें तो यही हुआ है. जहाँ जहाँ पर सरकार घिरी है वहीँ दूसरे मुद्दों ने अपनी तरफ धयान आकर्षित कर लिया है. आप इसके पीछे की क्रोनोलॉजी समझिये और खुद तय कीजिये की हमें अपने मुद्दों पर रहना है या जो सरकार तय करती है उसपर?

शुरुआत करते हैं हैदराबाद में हुए रेप काण्ड से, जिसके बाद पूरे देश में हलचल मच गयी थी लोग सरकार से सवाल करने लगे थे, ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ के वादों पर उंगलिया उठे लगीं थी।

सबसे पहले नज़र डालते हैं हैदराबाद में रेप काण्ड के पूरे घटनाक्रम पर-

27 नवंबर, हैदराबाद में एक प्रीती रेड्डी (बदला हुआ नाम) पशु चिकित्सक कोल्लुरु स्थित पशु चिकित्सालय गई थीं. उन्होंने अपनी स्कूटी को शादनगर के टोल प्लाजा के पास पार्क कर दिया था. रात में जब वह लौटी तो उनकी स्कूटी पंक्चर थी. इसके बाद उन्होंने अपनी बहन को फोन किया और इसकी जानकारी दी. उन्होंने बहन से कहा कि मुझे डर लग रहा है. इस पर बहन ने उन्हें टोल प्लाजा जाने और कैब से आने की सलाह दी थी.

लेडी डॉक्टर ने कहा कि कुछ लोगों ने मदद की पेशकश की है और थोड़ी देर बाद कॉल करती हूं. इसके बाद उनका मोबाइल फोन स्विच ऑफ हो गया. परिजनों ने शादनगर टोल प्लाजा के पास लेडी डॉक्टर की खोजबीन की, लेकिन वह नहीं मिलीं. सुबह शादनगर के अंडरपास के पास उसकी जली हुई लाश मिली.

इसके बाद पूरा भारत उठ खड़ा हुआ दोषियों की सज़ा के लिए मांग करने लगा, पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दो दिन के अन्दर ही 4 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया, उनके नाम पाशा, नवीन, केशवुलु और शिवा हैं| गिरफ़्तारी के बाद फ़ौरन सज़ा के लिए मांग उठने लगी. न्यूज़ चैनल्स पर यही छाया रहा हर जगह दोषियों के लिए फांसी देने की आवाज़ उठने लगी

5 दिसंबर को ख़बर आते ही लोग सन्न रह गए, दरअस्ल खबर थी की हैदराबाद के बाहरी इलाके शादनगर में पशु चिकित्सक के साथ गैंगरेप कर निर्मम हत्या करने वाले चारों आरोपित पुलिस द्वारा देर रात एनकाउंटर में मारे गए और एनकाउंटर उसी जगह पर हुआ, जहाँ उन दरिंदों ने पीड़िता के शव को जलाया था।

इस एनकाउंटर के बाद देश भर में खुशियाँ मनाई गयीं लेकिन कई जगह इस एनकाउंटर पर सवाल भी उठाये गये, मामला कोर्ट में पहुंचा, जिसमें समित बनायीं गयी जांच के लिए. कोई हैदराबाद के पुलिस को सलाम करता रहा तो कोई ये भी कहता नज़र आया की इसी तरह बीजेपी नेता कुलदीप सिंह सेंगर को भी गोली मारनी चाहिए. लेकिन इतिहास गवाह है इस तरह की सजा किसी नेता को नहीं मिली आजतक, और बीजेपी के नेताओं को तो बिलकुल नहीं. खैर ये मामला पूरी तरह मीडिया में चलता रहा. लेकिन किसी को क्या पता था कि पैटर्न बदलने वाला है नया मुद्दा सामने आने वाला है

 

उन्नाव में गैंगरेप पीड़िता को जला दिया गया-

अभी हैदराबाद में वेटनरी डॉक्टर से गैंगरेप-हत्या का मामला शांत नहीं हुआ था कि उन्नाव में एक रेप पीड़िता को जिंदा जलाने का मामला सामने आया गया. यहां एक रेप पीड़िता को जमानत पर छूट कर आए दो आरोपियों ने अपने तीन साथियों के साथ मिलकर जिंदा जला दिया. पीड़िता 90 फीसदी जल चुकी थी पीड़िता को एयरलिफ्ट से सफदरजंग अस्पताल लाया गया जहां उसका इलाज चल रहा है. यहाँ भी पुलिस ने पीड़िता को जलाने वाले पांचों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है| इस मामले ने भी सरकार को पूरी तरह से घेर लिए था. योगी सरकार पर सवाल उठने लगे थे पुलिस पर भी सवालिया निशान खड़े होने लगे थे|

वहीँ पर इसी वक़्त सरकार की अर्थव्यवस्था अपने 46 साल के सबसे निचली पायदान पर पहुँच चुकी थी. जीडीपी 4.5 पर आकर अपना दम तोड़ रही थी| सरकारी कम्पनियाँ बिक रही थीं रेलवे निजीकरण हो रहे थे| मंहगाई अपने चरम सीमा पर थी. लाज़िम है सरकार बुरी तरह से फंस चुकी थी. अपने किये हुए हर वादों में नाकामयाब हो चुकी थी. जल्द ही कुछ करना था लोगों का ध्यान भटकना था. इन सारे सवालों से बचने के लिए कुछ न कुछ करना था।

नागरिकता संशोधन कानून-

इसलिए आनन फानन में नागरिकता संशोधन क़ानून लाया गया. इसमें इतनी हड़बड़ी और जल्दी थी कि दोनों सदनों में पास भी करवा लिया गया. फिर क्या, वही हुआ जो सरकार चाहती थी, मुद्दे ग़ायब, सवाल ग़ायब. सबका ध्यान उधर चला गया और अपने प्लान में कामयाब हो गए. आज पूरा देश नागरिकता संशोधन क़ानून के चक्कर में उलझा हुआ है. किसी को बेरोज़गारी का एहसान नहीं. मंहगाई का ख्याल नहीं. अर्थव्यवस्था की तो फटी पड़ी है।

इस बिल के ख़िलाफ़ देश में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया. लोग सड़कों पर उतरने लगे. लोग इस बिल से ज़्यादा परेशान नहीं हैं बल्कि इसके बाद जो एनआरसी लाया जायेगा उससे परेशान हैं जैसा कि गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में दो बार कहा की वह इसके बाद पूरे देश में एनआरसी लागू करेंगे।

पूरा देश सड़कों पर उतर आया, कई जगह हिंसा की घटनाएँ हुईं जिसमें कई लोगों की मौत हुई. इसमें भी सरकार पूरी तरह बैकफुट पर चली गयी.इसका नतीजा ये हुआ की इस क़ानून को समझाने के लिए बीजेपी सरकार के नेता मीटिंग करने लगे रैलियां करने लगे।

बात यहीं नहीं रुकी तो इसके समर्थन में अमित शाह ने मिस कॉल के ज़रिये लोगों का समर्थन माँगा. जिससे समझ सकते हैं की सरकार कितना हिल गयी है. बस बहुमत की अना और ज़िद की वजह से बाज नहीं आ रही. जिसका असर अमित शाह के भाषण में दिखा जिसमें वो कहते हैं की इस क़ानून के लिए सरकार एक इंच पीछे नहीं हटेगी.

जामिया पर हमले से शुरू हुआ आन्दोलन-

जब नागरिकता संशोधन क़ानून दोनों सदनों में पारित हुआ उसके साथ ही जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों ने शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. 12 दिसंबर को जामिया में ही विरोध प्रदर्शन करके अपनी नाराज़गी दर्ज गयी. उसके बाद 13 दिसंबर को भी जामिया छात्रों का विरोध प्रदर्शन जारी रहा. जहाँ पुलिस की तरफ से लाठीचार्ज भी किया गया।

कईं लोगों को पुलिस ने हिरासत में भी लिया. इसके बाद यह प्रदर्शन आन्दोलन में बदलने लगा. जामिया के आस पास के लोग भी उनके साथ जुड़ गए. दिन 15 दिसंबर था जिसमें लोकल लोगों की काल थी की वह जामिया से संसद मार्ग तक लॉन्ग मार्च करेंगे. ओखला के निवासी उस मार्च की अगुवाई कर रहे थे की अचानक से जुलेना के पास कुछ उपद्रियों ने 3 बसों में आग लगा दी जिससे यह मामला बढ़ गया. इस प्रदर्शन ने हिंसा का रूप ले लिया।

दिल्ली पुलिस की बर्बरता-

15 दिसंबर को दिल्ली की पुलिस जामिया कैंपस में घुसकर छात्रों को मारती है यहाँ तक की लाइब्रेरी में भी आंसू गैस के गोले और लाठियां बरसायीं. उस दिन दिल्ली पुलिस का जामिया कैंपस में नंगा नाच रहा था जो पूरा देश देख रहा था. पुलिस को लगा था यहाँ इन लोगों को मार के इनकी आवाज़ दबा देंगे लेकिन ये उल्टा पड़ गया. अगले ही दिन पूरा देश जाग गया. सैकड़ों यूनिवर्सिटीज़ से समर्थन मिलने लगा. यहाँ तक की विदेश से भी लोग जामिया के समर्थन में उठ खड़े हुए और पुलिस की बर्बरता की कड़ी निंदा की।

अब पूरे देश में आन्दोलन शुरू हो गया. हर जगह हर शहर हर राज्य में लोग जामिया के समर्थन के साथ साथ इस क़ानून के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर गए. जामिया के छात्रों ने पूरे देश को जगा दिया. यहीं से इस आन्दोलन को नयी दिशा मिल गयी. विपक्षी पार्टियाँ भी खुल के सामने आ गयीं खासतौर पर कांग्रेस पार्टी की नेता प्रियंका गाँधी मैदान में आ गयीं।

वहीँ दूसरी तरफ जामिया के साथ ही अलीगढ़ विश्वविद्यालय में भी आवाज़ उठने लगी तो कुलपति के मिलीभगत से यूपी पुलिस ने नंगा नाच किया. नेशनल मीडिया के साथ साथ इंटरनेशनल मीडिया में ये मुद्दा उठने लगा. संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस पर चिंता ज़ाहिर की. हर तरफ बीजेपी सरकारी की थू थू होने लगी।

एनपीआर

इसी बीच एक और विवादित योजना को कैबिनेट से मंजूरी मिल गयी. अभी CAA चल ही रहा था कि एनपीआर आ गया.

NPR क्या है?

नैशनल पॉपुलेशन रजिस्टर यानी एनपीआर भारत में रहने वाले सामान्य निवासियों का एक रजिस्टर है। गौर करने वाली बात यह है कि यह भारतीय नागरिकों का नहीं बल्कि यहां रहने वाले लोगों (निवासियों) का रजिस्टर है। इसे ग्राम पंचायत, तहसील, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तैयार किया जाता है।

नागरिकता कानून, 1955 और सिटिजनशिप रूल्स, 2003 के प्रावधानों के तहत यह रजिस्टर तैयार होता है। NPR को समय-समय पर अपडेट करना एक सामान्य प्रक्रिया है और इसका उद्देश्य देश में रह रहे लोगों का अपडेटेड डेटाबेस तैयार करना है ताकि उसके आधार पर योजनाएं तैयार की जा सकें।

क्या NPR के बाद NRC की तैयारी है?

सरकार का कहना है कि एनपीआर और एनआरसी का आपस में कोई संबंध नहीं है। दूसरी तरफ विपक्ष खासकर कांग्रेस ने एनपीआर को एनआरसी की दिशा में पहला कदम बताते हुए सरकार पर झूठ बोलने का आरोप लगाया है। हालांकि, जिन नियमों के तहत एनपीआर की प्रक्रिया नोटिफाई की गई है, उसके मुताबिक यह एनआरसी से जुड़ी है। अगर सरकार एनपीआर को एनआरसी से अलग करती है तो उसे नियमों में बदलाव करना पड़ेगा।

 

NRC को लेकर जताई जा रही आशंका-

सरकार संसद से लेकर उससे बाहर तक बार-बार जोर देकर कहती रही कि संशोधित नागरिकता कानून से कोई भी भारतीय प्रभावित नहीं होगा क्योंकि यह भारतीय नागरिकों के लिए है ही नहीं। इसके बाद भी देशभर में इस नए कानून के खिलाफ उग्र प्रदर्शन हुए या जारी हैं जिसके पीछे बड़ी वजह इसे एनआरसी से जोड़कर देखा जाना है। CAA को मजहब के आधार पर भेदभाव वाला कानून बताकर विरोध हो रहा है।

यह कहा जा रहा है कि जब देशभर में एनआरसी लागू होगी तो उस वक्त नागरिकता साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज मुहैया नहीं करा पाने वाले गैर-मुस्लिम तो CAA की वजह से नागरिक बन जाएंगे लेकिन मुस्लिम अवैध घुसपैठिया करार दे दिए जाएंगे। हालांकि, सरकार इन आशंकाओं को सिरे से खारिज कर रही है और लोगों को ऐसी अफवाहों से बचने की सलाह दे रही है।

लेकिन सरकार एनआरसी पर साफ-साफ बात करने से बच रही है जिसकी वजह से लोगों के मन में सवाल पैदा हो रहे हैं। वह सीएए पर तो कह रहे हैं कि इससे कोई ख़तरा नहीं है लेकिन उसके बाद की प्रक्रिया के बारे में चुप्पी साध लेते हैं। सरकार कह दे कि हम एनआरसी नहीं लायेंगे, मामला अपने आप ख़त्म हो जायेगा।

शाहीन बाग़ की महिलाओं के जज़्बे सलाम-

इब सबके बीच देखा जाये तो जिसने सत्ता पर बैठी बीजेपी सरकार की किरकिरी की है या हिला के रख दिया है वो हैं दिल्ली के ओखला में शाहीन बाग़ में विरोध प्रदर्शन कर रही महिलाएं हैं. जिन्होंने सबका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया. देश ही नहीं विदेशी मीडिया का भी ध्यान खींचा. जिसकी वजह से यह प्रदर्शन बीजेपी के आँखों में खनकने लगा था. वजह यह है की इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं.

जेएनयू पर हमला-

5 जनवरी को देश की प्रमुख और चर्चित यूनिवर्सिटी जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय में 70-80 के करीब नक़ाबपोश आतंकियों में छात्रों और टीचरों पर हमला कर दिया. जो एक चर्चा का विषय बन गया सारा मीडिया इधर लग गयी. ये ब्रेकिंग न्यूज़ बन गयी जो की थी भी. तो वो हो ही गया काफी हद तक जो होना चाहिए था अब जब ये मुद्दा सामने आया देश में फैला ही था कि-

दिल्ली चुनाव का ऐलान हो गया-

चुनाव आयोग ने घोषणा की दिल्ली में 8 फरवरी को दिल्ली में वोटिंग होगी और 11 को नतीजे आएंगे। अब इसके बाद अंत में देखें तो 7 जनवरी को 7 साल से लंबित कोर्ट का फैसला आ जाता है, वो है निर्भया का मामला, जिसमें दोषियों को 22 जनवरी को फांसी दी जाएगी।

7 साल चले इस केस से पूरा देश ख़ुश है. इतने सालों बाद निर्भया को इंसाफ मिलने जा रहा है. लेकिन मामला यहाँ पर भी फंस जाता है। क्योंकि फांसी की जो डेट है उस दिन सुप्रीम कोर्ट में एक और बड़े मामले की सुनवाई होगी. जिससे कह सकते हैं आजकल पूरे देश में उबाल है, वह मामला है नागरिकता संशोधन क़ानून का जिस पर 22 को ही सुनवाई होगी।

अब देखने वाली बात है कि ये जहाँ से हम चले थे वहीं आकर पहुँच गए, बलात्कार से चले थे बलात्कार पर पहुंचे, मीडिया ने भी खूब खेल खेला और इसके पीछे सरकार अपनी नाकामियां छुपाती रही। मुद्दे ग़ायब, सवाल ग़ायब. वहीं पर खड़े हैं।