भारत में जल समस्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। नीति आयोग की रिपोर्ट ने इस बात का खुलासा किया है कि आने वाले 2 से 5 वर्षों में पानी की कमी और बढ़ सकती है। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे हालात दूसरे राज्यों में भी बनने वाले हैं। वक़्त रहते अगर इसे गहन संज्ञान में नहीं लिया गया तो जल समस्या किसी प्राकृतिक प्रकोप की तरह जल जीवन को अस्त व्यस्त कर सकती है। समस्या की गंभीरता यह है कि गाँव में भी जल स्तर नीचे चला गया है। गर्मी शुरू होते ही लगभग 80% नालों में पानी आना बंद हो जाता है। तापमान भी 45 से 50 तक पहुँच कर मनुष्यों के साथ जानवरों के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर रहा है। तालाब भी लगभग ख़त्म हो चुके हैं। गाँव के तालाबों पर क़ब्ज़ा इतना तेज़ हो गया है ऐसा लगता है कि अगर अपने घर या ज़मीन से जुड़े तालाब पर क़ब्ज़ा ना किया गया तो ईश्वर नाराज़ हो सकता है। इस लिए इसे पुण्य समझ कर किया जा रहा है। इस में ग्राम प्रधान से ले कर थाना और ब्लाक के अधिकारी सब किसी ना किसी तरह शामिल होते हैं। बाग़ बगीचे, खेत खलियान और ताल तलैया सब जगह सीमेंट और ईंटें हैं। यह अलग बात है कि मकान खाली हैं क्यूंकि लोग शहरों में किराये पर रहते हैं।

जिस तरह से गांवों पेड़ और तालाब ख़त्म हो रहे हैं जल संकट और निकट आता जा रहा है। राज्य सरकारों को कोई ऐसा नियम लाना चाहिए जिस में हर गांव में आबादी और क्षेत्र के हिसाब से छोटे बड़े तालाब और हर वर्ष कम से कम 2000 पेड़ लगाने अनिवार्य हों। पुराने बड़े तालाबों पर क़ब्ज़ा बंद हो और बाग लगाने के लिए सरकारी मदद उपलब्ध कराई जाये। ऐसे ही शहरों में किसी भी फैक्ट्री या बड़ी इमारत खड़ी करने पर पेड़ लगवाए जाएँ। स्वच्छ भारत और स्वस्थ भारत का सपना एक साथ साकार होता दिखाई देने लगेगा।

जल संसाधनों में होने वाले भ्रष्टाचार पर अगर त्वरित कार्यवाई ना की गई तो शायद बहुत देर हो सकती है। हर वर्ष जल समस्या के कारण होने वाली सैकड़ों मौतों में कुछ और लोगों का इज़ाफ़ा हो जायेगा। हालाँकि आज की नाकारा और मर्यादा विहीन राजनीति के लिए भारतीय जानों की कीमत बड़ी सस्ती है। ज़रा सी लालच या ईगो के लिए कई जानें ली जा सकती हैं। और हाँ इन गंभीर समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए “जय श्री राम” और “अल्लाहु अकबर” की प्रतियोगिता और उस पर समाज की मुर्खता भी काफी है।

जब मुर्खता का नशा उतरे तो समाज को इन गंभीर समस्याओं पर भी ध्यान दे लेना चाहिए वर्ना होनी को कौन टाल सकता है। अपनी नाकामी को विधि का विधान समझा जा सकता है। ग़ालिब साहब ने तो पहले ही कह दिया था “दिल के बहलाने को ग़ालिब यह ख्याल अच्छा है”