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आज नियति और नीति को लेकर हज़ारों सवालों से घिर चुके नागरिकता संशोधन क़ानून पर वकीलों और क़ानून निर्माताओं को निष्पक्ष चर्चा करने की अति आवश्यकता है। क्यूंकि धीरे धीरे इस क़ानून को लेकर भ्रम और शंकाओं की सीमायें बढती जा रही हैं। जैसे जैसे डर, भ्रम और शंका बढ़ रही है वैसे वैसे देश के अलग अलग हिस्सों में एक शाहीन बाग़ की स्थापना होती जा रही है।

यूँ तो नागरिकता संशोधन क़ानून के विरुद्ध आसाम और बंगाल में बिल ड्राफ्ट किये जाने और उस पर चर्चा के दौरान से ही विरोध हो रहा था लेकिन उसे कानूनी प्रारूप देने के बाद देश भर में इस के विरुद्ध प्रदर्शन शुरू हो गए। इन्हीं प्रदर्शनों की श्रेणी में एक एतिहासिक जगह दिल्ली का विश्व चर्चित विश्वविद्यालय जामिया मिल्लिया इस्लामिया है। यूँ तो इस कैंपस से दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय की तरह देश वर्तमान मुद्दों पर सत्ता से सवाल और उस आन्दोलन नहीं होते। लेकिन इस नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर जामिया में एक शांति पूर्ण धरना प्रदर्शन शुरू हुआ।

जामिया कैंपस के बाहर रोड पर यह विरोध प्रदर्शन चल रहा था। प्रदर्शन के दूसरे दिन जामिया से संसद तक मार्च की तयारी थी। प्रशासन ने पूरी ताक़त से इसे रोकने की कोशिश की और आखिर में ऐसा कुछ किया जामिया का आन्दोलन विश्व विख्यात बन गया।

जामिया के विद्यार्थियों द्वारा शांति पूर्ण प्रदर्शन को पुलिस की लाठी और गोली से रोकने की कोशिश हुई। लाठी और गोली का नशा और प्रदर्शनकारियों के प्रति नफ़रत और आक्रोश की आग ने संवैधानिक अधिकारों को सूली पर लटका दिया और पुलिस कैंपस में घुस गई। लाइब्रेरी में पढ़ रहे बच्चों पर लाठियां और आंसू गैस के गोले दागे और बाथरूम में घुस कर लड़कियों के साथ बाद तमीजी की और मारपीट किया।

पुलिस की इस बर्बरता ने दिल्ली के शाहीन बाग़ को एक नया रूप दे दिया। महिलाये और लड़कियां सड़कों पर उतर आयीं और पुलिस की इस बर्बरता और नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ एक असीमित समय का आन्दोलन शुरू कर दिया। देखते देखते जामिया के समर्थन में देश विदेश की 25 से ज़्यादा यूनिवर्सिटीज आ गयीं तो वहीँ देश के कोने कोने में एक शाहीन बाग़ बनने लगा।

शाहीन बाग़ के धरना प्रदर्शन को आज 50 दिन से ज़्यादा हो गए हैं और अब तक देश भर में 125 शाहीन बाग़ बन चुके हैं।

इस प्रदर्शन का कोई चेहरा नहीं है और न ही कोई संगठन की इस की अगुवाई कर रहा है। इस की मुख्य वजह यह रही कि अब तक मिल्ली तंजीमों और पेशेवर सियासत दानों ने आम नागरिक के इन भावों का सौदा ही किया है। इस लिए इस तरह की किसी भी शख्सियत से इसे नहीं जोड़ा गया। और चूँकि यह मुदा किसी समुदाय विशेष और धर्म विशेष का नहीं था इस लिए भी समुदाय या धर्म आधारित संगठनों को इसकी अगुवाई की इजाज़त नहीं मिली।
लेकिन इन सगठनों, इन के संचालकों और अगुवा कारों ने भी इस प्रदर्शन में अपना कोई योगदान देना मुनासिब नहीं समझा क्यूंकि इस वक़्त ज़रूरत यह थी कि इस प्रदर्शन को एक आम आदमी की तरह मज़बूत किया जाता। राजनैतिक लाभ ना मिलने की वजह से इन लोगों ने घर की काम काजू महिलाओ और लड़कियों को अकेला छोड़ दिया।

कोई संगठित व्यवस्था ना होने की वजह से यह राजनैतिक बाज़ार में बिकने से तो बच गया लेकिन राजनैतिक और संगठन की सूझ बूझ रखने वालों के व्यक्तिगत योगदान न मिलने की वजह से कई मुश्किलें भी खड़ी हो गयीं। इसी प्रदर्शन से नौजवानों का एक नेतृत्व खड़ा होना था लेकिन ऐसा नहीं हो सका बल्कि इस प्रधार्शन को संबोधित करने के लिए आने वाले राजनैतिक हस्तियों ने अपने सियासी फ़ायदे उठाने शुरू कर दिए।

शुरू में इस का पता नहीं चला लेकिन जब इस आभास हुआ तो काफी देर हो गयी है। अपने भाषणों में अपने राजनैतिक वक्तव्यों के लिए प्रदर्शन कारियों के मंच का इस्तेमाल हुआ। जोश जोश में बहुत से ऐसे नारे लगे जिन की आवश्यकता नहीं थी। और फिर सरकार ने भी अपना राजनैतिक गेम अछे से खेला। प्रदर्शन को लम्बा होने दिया। धैर्य की परीक्षा ली गई और फ़िर एक शरजील तैयार किया गया। प्रदर्शन कारियों और पुलिस की वर्दी में अराजक तत्वों को शामिल किया गया और प्रदर्शन को हिंसक बना दिया गया।

देखते देखते प्रदर्शन को देश विरोध और राष्ट्र विरोधी बताया जाने लगा। धरने पर बैठी महिलाओं पर घटिया आरोप लगाये जाने लगे ताकि जोश बढे दिमाग कम काम करे और सरकार को मौके मिलें। देखते देखते ऐसा कुछ हो गया कि गोली और गाली से शाहीन बाग़ को निशाना बनाया गया। बदले में दिल्ली और देश से बीजेपी को हराने की बात मंच से कही जाने लगी और इस तरह धरना को मूल मुद्दे से हटा कर पूर्ण रूप से राजनैतिक बना दिया गया।
आज दिल्ली का शाहीन बाग़ जो देश भर के शाहीन बाग़ों के लिए प्रेरणा का स्रोत है वह राजनैतिक हथकंडों की ज़द में है। उस ने भद्दे और घटिया आरोप सहे, गोलियों और गालियों के हमले सहे, उन्हें पाकिस्तानी, देश द्रोही और राष्ट्र विरोधी कहा गया वो हाथों में तिरंगा और संविधान लिए बापू के सिधान्तों पर डटे रहे।

जान गई, जिस्म टूटा, इज्ज़त और मान मर्यादा पर हमला हुआ लेकिन उन का हौसला नहीं टूटा। 2 डिग्री की ठण्ड, पुलिस की लाठियां, गुंडों की गोलिया, नेताओं की गलियां उन्हें झुका नहीं सकीं। लेकिन उन के मुद्दे राजनीति की भेंट चढ़ गए। उन्हों वह सब कुछ किया जो कर सकती थीं।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इसे कमज़ोर किया गया सरकार के षड्यंत्रों को मीडिया ने वैचारिक रूप दिया। इसे कभी हिन्दू विरोधी कभी दलित विरोधी तो कभी संविधान विरोधी बताया। नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर कोई विस्तरित चर्चा तो हुई नहीं। इस लिए उस के संवैधानिक, लीगल और क़ानूनी पहलुवों पर कोई भी एकमत विचार सामने नहीं आया। अधिकतर लोगों का भी यही कहना रहा कि नागरिकता संशोधन क़ानून से कोई समस्या नहीं है। असल विरोध तो एन आर सी का है जो सरकार की तरफ़ से अभी ड्राफ्ट ही नहीं किया गया है।

रकार ने NRC नाम का एक भ्रमित डर फैलाया और देश में फिर से राजनैतिक ध्रुवीकरण की संभावनाएं बढ़ गयीं।
अब सवाल यह होता है कि आगे क्या किया जाये। क्यूंकि देश के शांति पसंद, लोकतंत्रवादी और संवैधानिक विचारों वाले बहुसंख्यक में से अभी भी बहुतायत संख्या वैचारिक सहमती रखती है लेकिन साथ ही वह एक विस्तरित, सामूहिक और असल मुद्दे पर गंभीर चर्चा भी चाहती है।

देश में हज़ारों संगठन हैं जो सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक के साथ साथ संवैधानिक, शासनिक और प्रशासनिक मामलों में जागरूकता का काम करते हैं। इस मुद्दे में तो यह सब शामिल हैं।इस पर एक तफ्सीली गुफ्तगू ज़रूरी है। छोटे सेमिनार, संगोष्ठी, सम्मलेन और जन चेतना प्रोग्राम हों।

विरोध या समर्थन जताने के लिए नहीं बल्कि CAA को लेकर देश के आम नागरिक की राय, समझ, मांग और प्राथमिकता जानी जाये। यह सच है कि CAA के विरोध और समर्थन में इतना कुछ भ्रम फैल गया है कि असल मुद्दा ख़तम होता नज़र आ रहा है। अब तो राजनीति हावी होती दिख रही है। इस लिए इस से पहले कि यह कोई और रूप ले इस विषय पर गहन चर्च समय की सब से बड़ी मांग है।