इस वक़्त कांग्रेस का सब से चिन्हित, परिचित और प्रचलित के साथ साथ विश्वास प्राप्त करने वाला चेहरा प्रियंका गाँधी वाड्रा मेरठ मुज़फ्फर नगर समेत यूपी के अलग अलग जगहों पर जा कर पीड़ितों से मिलने और उन्हें सांत्वना देने के काम में व्यस्त है। आज की राजनैतिक परिस्थितियों की भी लगभग यही मांग है। लेकिन इया पीड़ितों से मिल भर लेना काफ़ी है? जिस तरह आज पूरा देश विचलित और बेचैन है।

आशंकाओं के डरवाने बादलों से घिरा हुआ हुआ है। ऐसी में देश व्यापी आन्दोलन का महज़ वादा करने वाली कांग्रेस पार्टी किसी भी आंदोंलन के आयोजन और प्रबंधन का हिस्सा नहीं है। हालाँकि एक एक हिसाब से यह बीजेपी का जवाब भी है कि कांग्रेस अभी भी बीजेपी की झूट, आरोप प्रत्यारोप, प्रोपगंडा और अफवाहों की मार से बाहर नहीं आ पाई है। वह दूर से ही आन्दोलन राजनैतिक नतीजा पाने की आस में लगी हुई है। पार्टी का कोई भी शीर्ष नेतृत्व किसी भी आन्दोलन की जगह नहीं पहुँचा।

आज 20 दिन से ज्यादा हो गए हैं दिल्ली के शाहीन बाग में औरतें और बचे धरने पर बैठे हुए हैं। किसी भी पार्टी का कोई भी मुखिया अभी तक वहां नहीं पहुंचा। सत्ताधारी पार्टी से भी कोई नहीं पहुंचा कम से कम यह बताने की उन्हों ने NRC और CAA को सही से समझा नहीं है। उन में से किसी को घबराने की ज़रूरत नहीं है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल CAA और NRC के साथ NPR का विरोध तो करते हैं लेकिन शांति पूर्ण विरोध प्रदर्शन करने वालों से मिलने का मौक़ा अभी तक किसी को नहीं मिला है।

राजस्थान के मुख्य मंत्री अशोक गहलोत आज धरना पर इस लिए बैठ गए क्यूँ जोधपुर अस्पताल में 100 अधिक बच्चों कि मौत पर सवाल खड़े होने लगे थे। ख़ुद राजस्थान के उप मुख्यमंत्री ने भी ज़िम्मेदारी लेने कि बात कह दी।
उत्तर प्रदेश में हुए पुलिसिया दमन के ख़िलाफ़ किसी भी भी पार्टी का कोई स्पष्ट आन्दोलन नहीं है।

सड़कों पर उतरे दलितों से दलित से महारानी बन चुकी मायावती को कोई दिलचस्पी नहीं है। अखिलेश यादव ने प्रदेश व्यापी आंदोंलन का एलान तो कर दिया था लेकिन ना जाने किस फाइल के डर से उन्हों ने इस बड़े पैमाने पर होने वाले आन्दोलन को वापस ले लिया। लखनऊ में प्रदर्शन और उस ने शामिल लोग हिंसक नहीं होते अगर अपने घोषणा अनुसार अखिलेश यादव रैली का प्रबंधन करते।

इस वक़्त राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी को यह तय करना है कि देश को और जलने देना है या हाथ में लीडरशिप ले कर करोड़ों हिंदुस्तानिओं उम्मीद भरी नज़रों में अपने आप को उठाना है। जिस तरह देश के मुट्ठी भर लोग गाँधी विरोधी हो गए है और गाँधी विचारों के विरोध में संविधान के पन्नों को भारतीयों के खून से रंग रहे हैं इस पर गाँधी परिवार और कांग्रेस और गाँधी विचारधारा की आखरी दोनों उम्मीदों राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी आशानिक्त ख़ामोशी उन करोड़ों हिन्दुस्तानियों का मनोबल तोड़ रहे हैं जो अभी भी गाँधी विचारधारा में विश्वास रखते हैं। भारत कि बहुसंख्यक आबादी अभी भी गाँधी और अम्बेडकर के साथ है। गोडसे कभी भी भारत कि विचारधारा नहीं रहा और ना ही भविष्य में होगा। गोडसे विचारधारा कल भी भारत विरोधी थी और आज भी भारत और भारतीयता विरोधी है।