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देश या राज्य की राजनीति में चुनाव और झूठे वादे एक-दूसरे का पर्याय बन चुके हैं. लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में वायदों का अपना महत्व है और इन्हीं वायदों से यह पता चलता है कि आखिर हमारे राजनेता समाज और देश के विकास को कौन सी शक्ल देना चाहते हैं. परंतु जनता का दुर्भाग्य ही है कि पिछले कुछ दशकों से चुनावी वादे झूठ की गठरी और जुमला बनकर रह गए हैं. इनके बीच अगर कोई पूरी ईमानदारी और दिल की गहराइयों से जनता की बुनियादों समस्याओं को हल करने का वादा भी करता है, तो अमूमन उसे हरा ही दिया जाता है. इसके लिए हमारी राजनीति का मौजूदा माहौल और स्तर तो ज़िम्मेदार है ही, उसके साथ ज़िम्मेदार है जनता.क्योंकि जो भारत दुनिया को सत्य और अहिंसा का रास्ता दिखाने वाला देश है उसी में राजनीति का स्तर जिस तरीके से गिरता जा रहा है,यह गंभीर मामला है.
छोटे से छोटा चुनाव हो या देश का आम चुनाव.चुनाव दर चुनाव वादों के झूठ और खोखली घोषणाओं की बाढ़ आती रही है.जोकि किसी आपदा से कम नही है. इन घोषणाओं के अर्थात झूठ के साये में धनबल, बाहुबल या सस्ती लोकप्रियता के आधार पर चुनाव जीतकर सत्ता में पहुंचने वाले नेता न केवल अपने वादे भूल जाते हैं, बल्कि अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी से भी मुह मोड़ लेते है. दूसरे शब्दों में झूठ का सहारा लेकर नेता चुनाव जीतते हैं और देश की जनता हर चुनाव हार जाती है.इस तरह चुनाव के दौरान और उसके बाद देश के संविधान की धज्जियां उड़ाई जाती हैं.यह तो जगज़ाहिर है.
देश और राज्य में हुए पिछले कुछ चुनावों की ही बात करें तो विधानसभा या लोकसभा चुनाव इसके उदाहरण हैं. मध्यप्रदेश में ही 2013 का शिवराज सिंह चौहान का संकल्प पत्र उठाकर देखें तो उसके ज्यादातर वादे अधूरे हैं.इसी मध्यप्रदेश में फिर दृष्टि पत्र और वचन पत्र के नाम से झूठ की किताब छपी है.जिससे कि जनता को फिरसे गुमराही के अंधेरे में धकेल दिया जाए. हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी राजनीतिक दलों ने चुनावी वादों की झड़ी लगा दी थी. जैसे बेरोजगारी भत्ते के तौर पर 12वीं पास को पांच से छह हजार और ग्रेजुुएट बेरोजगार को 8 से 9हजार रुपए प्रति माह देने का वादा किया गया था.जबकि कॉलेज जाने वाली छात्राओं को स्कूटी, हर घर में छह सिलेंडर मुफ्त देने और हर गांव को वाई-फाई जोन में तब्दील करने जैसी घोषणाएं इसी का हिस्सा थीं, लेकिन किसी दल ने यह नहीं बताया कि यह सब करेंगे कैसे? किसानों की कर्ज माफी, गरीबों को सस्ता मकान और अनाज, बेरोजगारी भत्ता और सरकारी कर्मचारियों के मामले उत्तर प्रदेश चुनाव में खूब ज़ोर शोर से उठाए गए.लेकिन हकीक़त यह कि कर्ज़ उन किसानों का माफ हुआ जो कि डिफाल्टर थे.आम किसान का कर्ज माफ नही हुआ.इसकी अगर जांच हो तो बड़ा घोटाला सामने आएगा.बहुत से मुद्दे चुनावी घोषणापत्रों का हिस्सा बनते हैं लेकिन किसी दल ने इन्हें गंभीरता से नहीं लिया है और चुनाव के बाद ये वायदे महज जुमले बनकर रह जाते हैं. भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के आम चुनाव के अपने घोषणा पत्र में 15 लाख का एक ऐसा वादा किया,जिसके मिलने वाले व्यक्ति की खोज वैज्ञानिक नही कर पाए.जनता के बीच अच्छे दिन की उम्मीद जताई लेकिन चार साल बाद भी अच्छे दिनों के कोई आसार नजर नहीं आते हैं.
हालांकि देश की आजादी के तुरंत बाद ही देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश की तस्वीर बदलने की पूरी कोशिश की और उसी का नतीजा है कि आज हम दुनिया के चंद सबसे मजबूत देशों में शुमार होते हैं. लाल बहादुर शास्त्री जी के काल खंड में भी योजनाओं को जमीन पर उतारने और जनता से किए गए वादों को पूरा करने की जद़्दोजहद साफ दिखाई देती है.जय जवान, जय किसान के नारे को शास्त्री जी ने जमीन पर उतारा. नरसिम्हा राव सरकार ने भी देश को मुश्किल हालात से निकालने के लिए एक रास्ता चुना. आर्थिक उदारीकरण का यह रास्ता गलत था या सही, यह अलग बात है, लेकिन जनता से वादे को सर्वोपरि रखने का उदाहरण तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों ने भी अपने घोषणापत्रों को गंभीरता से लेते हुए कुछ जरूरी काम पूरे किए.
हाल के दिनों में उदाहरण के रूप में देखें तो आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार ने अपने घोषणापत्र के 70 में से 50 से ज्यादा वायदे पूरे किए हैं और अब मध्य प्रदेश में एक नई लकीर खींचते हुए पार्टी के मुख्यमंत्री पद के दावेदार आलोक अग्रवाल ने अपने वादों को स्टाम्प पेपर पर लिखकर दिया है. यह कदम राजनीति में बढ़ रही झूठ और जुमले की संस्कृति को चुनौती देता है, साथ ही साफ सुथरी और गंभीर राजनीति की ओर जाने का महत्वपूर्ण तरीका भी है.
इस मंजिल तक पहुंचने के लिए जरूरी है कि हम राजनीतिक घोषणापत्रों को उनकी गंभीरता लौटाएं. इसके लिए चुनावी सुधार में घोषणापत्रों के प्रति राजनीतिक दलों की प्रतिबद्धता सुनिश्चित करना जरूरी है. चुनावी घोषणापत्र को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए और किसी भी सरकार का आकलन उसके घोषणापत्र के वायदों के आधार पर किया जाना चाहिए. होना यह भी चाहिए कि यदि कोई दल सत्ता में आने के बाद अपना घोषणा पत्र पूरा न कर सके तो जनता को उस सरकार के खिलाफ अदालती कार्रवाई का अधिकार भी होना चाहिए.साथ ही अगर पर्याप्त कारण और संतोषजनक जवाब न मिलें तो चुनाव आयोग को उस दल की मान्यता रद करने जैसे कठोर कदम का प्रावधान भी करना चाहिए.
(हसन हैदर)