57 Views

प्रेस विज्ञप्ति
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने 19 जुलाई 2019 को लोकसभा में आरटीआई संसोधन विधेयक पेश किया है. प्रस्तावित संसोधन सूचना के अधिकार कानून को पीछे धकलने वाले और सूचना आयोग की स्वतंत्रता को बहुत कम करने वाले हैं. पारदर्शिता के लिए सबसे अधिक उपयोग किये जा रहे और सबसे मज़बूत कानून को कमजोर किया जा रहा है.

यह गंभीर चिंता का विषय है कि आरटीआई कानून में संशोधन पूरी गोपनीयता के साथ किए जा रहे हैं, जो केंद्र सरकार की पूर्व-विधान परामर्श नीति का उल्लंघन है, जो सार्वजनिक प्रकटीकरण और मसौदा कानूनों पर परामर्श को अनिवार्य करती है. कानून के मसौदे को संसद में अलोकतांत्रिक तरीके से पेश किया गया क्योंकि संसोधित मसौदे को सांसदों, नागरिकों और मीडिया को तब तक पता नहीं चला जब तक कि बिल को पेश किये जाने की पूर्व संध्या पर लोकसभा के सदस्यों को प्रसारित नहीं किया गया था।

संसोधित मसौदे में एकतरफा केंद्र और राज्यों में सूचना आयुक्तों की सेवा की अवधि, वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तों को तय करने के लिए विधेयक में आरटीआई कानून में संशोधन करने का प्रयास किया गया है । राजग सरकार ने कानून की एक बुनियादी विशेषता को गलत तरीके से अर्थ लगाकर नियम बनाने के कार्य के रूप में पेश करके ऐसा किया है..

जैसा कि आरटीआई कानून आज है , यह सूचना आयुक्तों के लिए 5 वर्षों के निश्चित कार्यकाल प्रदान करता है (65 वर्ष की अधिकतम आयु सीमा तक )। इसके अलावा, केंद्रीय सूचना आयोग के प्रमुख के वेतन, भत्ते और अन्य शर्तें मुख्य चुनाव आयुक्त के समान ही होती हैं। यह मौजूदा कानून की बुनियादी संरचना का एक हिस्सा है और इसलिए इन प्रावधानों में कोई भी संशोधन आरटीआई कानून के मूल ढांचे को कमजोर करेगा।

कानून बनाने के दौरान सूचना आयुक्तों की स्थिति पर संसद की स्थाई समिति सहित व्यापक चर्चा की गई थी, और स्थाई समिति ने माना कि ” सूचना आयोग कानून के तहत एक महत्वपूर्ण अंग है जो कानून की अति महत्वपूर्ण प्रणाली को क्रियान्वित करेगा, इसलिए, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यह पूरी तरह से स्वतंत्रता और स्वायत्तता के साथ काम कर सके. इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए यह सिफारिस की गई थी कि केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की स्थिति वैसी ही रहे जैसी मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की होती है. सूचना आयुक्तों की स्थिति को स्वायत्त रखने के लिए स्थाई समिति की सिफारिश को सार्वजनिक और संसदीय परामर्श की एक व्यापक प्रक्रिया के माध्यम से संसद द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार और पारित किया गया था। एक उच्च कद के अनुसार, और इसे संवैधानिक निकायों के पदाधिकारियों के बराबर करके सेवा की शर्तों की रक्षा करना जैसे स्वतंत्र वैधानिक निकायों के लिए नियमित रूप से अपनाया जाता है केंद्रीय सतर्कता आयोग और लोकपाल सहित.

आयोगों के कामकाज को और कार्य प्रणाली को शासित (नियंत्रित) करना सूचना आयोगों को मूल रूप से कमजोर करेगा क्योंकि यह स्वतंत्र रूप से कार्य करने की उनकी क्षमता को कम करेगा। सूचना आयोग अंतिम प्राधिकरण हैं जो इस बात का फैसला करते हैं कि नागरिक को किसी विषय पे सूचना, जो संविधान में एक मौलिक अधिकार हैं, मिलनी चाहिए या नहीं। सूचना का अधिकार कानून आयोगों को स्वायत्तता से सशक्त इसलिए बनाया कि वे बड़े से बड़े कार्यालयों से भी इस कानून की पालना करवा सके। इसके अलावा, केंद्र सरकार राज्यों के सूचना आयोगों के सूचना आयुक्तों के कार्यकाल, वेतन और भत्ते तय करना चाहता हैं। इसमें संघवाद का मुद्दा प्रमुख रूप से उठता है और केंद्र सरकार के केंद्रीकृत और अलोकतांत्रिक निर्णय लेने का एक संकेत है। 2017 में 19 न्यायाधिकरणों और प्राधिकरणों को वित्त अधिनियम में संशोधन लाकर विनियमित किया गया था। इसी प्रकार के कई मामले हैं जिनमें सरकार ने नियम बनाकर न्यायाधिकरणों / प्राधिकरणों के पदाधिकारियों के कार्यकाल को कम कर दिया है।

मुद्दों की एक विस्तृत श्रृंखला है जिसके लिए सरकार को तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है और उसके लिए आरटीआई कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता के उच्च मानकों को बढ़ावा देने के लिए तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है । इनमें शामिल है:
· सूचना आयोगों में रिक्त पदों को भरने के लिए समयबद्ध और पारदर्शी नियुक्तियां करना
· सूचना चाहने वालों पर हमलों के मुद्दे का समाधान करना- देश भर में 80 से अधिक आरटीआई उपयोगकर्ताओं की हत्या कर दी गई है।
· व्हिसल ब्लोअर्स प्रोटेक्शन एक्ट लागू करना
· अनिवार्य स्वतः प्रकटीकरण (Pro Active Disclosures) को मज़बूत करने के लिए सूचना के अधिकार की धारा 4 के ख़राब क्रियान्वयन को ठीक करना, जिसकी कमी इस सरकार की कुछ सबसे व्यापक व्यापक नीतियों जैसे कि नोटबंदी में तीव्रता से महसूस की गई।
· चुनावी चंदे में पारदर्शिता की पूर्ण कमी को ठीक करना

यह अकल्पनीय है कि इनमें से कुछ मुद्दों पर, जो वर्तमान में सूचना के जन अधिकार को कमजोर कर रहे हैं का समाधान करने के बजाय, एनडीए सरकार ने आरटीआई कानून के तहत निर्णय करने वाले प्राधिकारियों की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को नष्ट करने ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया है। यह नवीनतम विधायी चालाकी इस सरकार की इस देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की चाल का एक और उदाहरण है।

RTI कानून का उपयोग हर साल देश के लगभग 60 लाख लोगों द्वारा किया जाता है । यह आम नागरिकों के लिए सबसे मजबूत उपकरण साबित हुआ है जिससे वे अपने मौलिक अधिकार को जान सकते हैं और सत्ता को जवाबदेह बना सकते हैं । 2005 में संसद में कानून का पारित होना लोगों के आंदोलनों और अभियानों के लिए एक जीत थी, जो लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए लाखों नागरिकों की इच्छा और इरादे का प्रतिनिधित्व करती थी।

सूचना के जन अधिकार का राष्ट्रीय अभियान (एनसीपीआरआई) पूरी तरह से एनडीए सरकार द्वारा लाये गए संशोधनों को अस्वीकार करता है, और मांग करता है कि उन्हें तत्काल प्रभाव से वापस ले लिया जाए। एनसीपीआरआई सरकार को यह भी याद दिलाना चाहेगा कि वह अपने विधायी कार्य को करने में उचित प्रक्रिया का पालन करे और यह सुनिश्चित करे कि सभी कानूनों के मसौदों (संशोधनों सहित) को पूर्व-विधायी परामर्श प्रक्रिया के माध्यम से रखा जाए। जो संशोधन लोगों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करे, उन्हें उचित संसदीय स्थायी समितियों को भेजकर उन पर व्यापक बहस और चर्चा के माध्यम से रखा जाना चाहिए। एनसीपीआरआई इन प्रतिगामी संशोधनों का विरोध करेगा और इस पर जनता की राय जुटाएगा, ताकि लोगों के इस कानून की रक्षा की जा सके।