2019 का लोकसभ चुनाव कई तरह से दिलचस्प है। राहुल की केरल में इंट्री हो या बेगूसराय में कन्हैया की चर्चा, वाराणसी से मोदी के खिलाफ फौजी हो या फ़िरोज़ाबाद में चाचा शिवपाल और भतीजे अक्षय की टक्कर, 2019  की चुनावी सरगर्मियां  दिलचस्प होने  के साथ साथ  धड़कनें बढ़ाने वाली भी हैं। सिरसा गंज, टूंडला,जसराना, शिकोहाबाद और फ़िरोज़ाबाद शहर जैसी पांच विधान सभाओं वाले लोक सभा क्षेत्र फ़िरोज़ाबाद में इस वक़्त चुनावी गर्मी का पारा हाई है। एक तरफ मौजूदा सांसद अक्षय यादव हैं जो रामगोपाल वर्मा के पुत्र हैं और इस वक़्त माया अखिलेश के “सा-थी” महागठबंधन की तरफ से फ़िरोज़ाबाद के प्रत्याशी हैं। समजवादी पार्टी किसी भी क़ीमत पर यादवों के इस गढ़ से सीट गवाना नहीं चाहेगी। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी को इस शिखर पर पहुँचाने में अतुल्य एवं अमूल्य किरदार निभाने वाले शिवपाल यादव हैं जो अपनी नव निर्मित पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी से उम्मीदवार हैं। फ़िरोज़ाबाद लोकसभा में लगभग साढ़े चार लाख यादव वोट है उस के अलावा ढाई लाख जाटव और डेढ़ लाख मुस्लिम है और इतना ही सवर्ण वोटर है। यादव राजनीती का आधार वोट मुस्लिम और यादव है। अब उस के साथ गठबंधन भी है। इस हिसाब से देखा जाये तो अक्षय यादव का पलड़ा भरी नज़र आता है। लेकिन राजनीती में किसी भी दृष्टिकोण को अनदेखा नहीं किया जा सकता। अक्षय यादव इस सीट से मोदी लहर में भी जीत गए थे लेकिन इसी सीट से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव चुनाव हार चुकी हैं। इस वक़्त पूरे लोकसभा क्षेत्र में तीन चीज़ें देखने को मिल रही हैं। गुस्सा, जोश और उम्मीद। गुस्सा इस बात का है कि पिछले पांच वर्षों में मौजूदा सांसद की पहुँच आम जनता तक नहीं हो सकी। इन्हीं बीते वर्षों में फ़िरोज़ाबाद के युवाओं को कई झूठे मुक़दमों में फंसा कर जेल भेजा गया और उन पर लाठियां बरसाई गयीं। सिरसा विधान सभा के बहुचर्चित और लोक प्रिय पूर्व विधायक हरिओम यादव को भी प्रताणित किया गया और साथ ही उन के बेटे जो कि जिला पंचायत अध्यक्ष थे, उन के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कर अपमानित किया गया और कुर्सी छीन ली गयी। इन के अलावा फ़िरोज़ाबाद सदर से पूर्व विधायक अज़ीम भी इसी तरह की प्रताणना  का शिकार हुए हैं। जो नाराज़ हो कर शिवपाल की चाभी में विश्वास, सम्मान और सहभागिता देखते हैं। इस तरह यादव मुस्लिम की नाराज़गी सीधे मौजूदा सांसद से है। समाजवादी यादवों के इकलौते नेता मुलायम सिंह यादव जी के रानैतिक बहिष्कार की साज़िश और समाजवादी पार्टी को जन जन तक पहुँचाने के लिए और समाजवादियों के आंदोलन करने वाले समाजवादी पार्टी का दूसरा बड़ा चेहरा शिवपाल यादव के अपमान का भी ज़िम्मेदार प्रोफेसर रामगोपाल यादव को समझा जा रहा है। शिवपाल यादव ने भाई और बहु को पूर्ण सम्मान दिया और मैनपुरी एवं इटावा से अपना प्रत्याशी नहीं उतारा, वहीँ फ़िरोज़ाबाद से रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव शिवपाल के सामने हैं। यही नहीं फ़िरोज़ाबाद में बिजली, पानी, सड़क, प्रदुषण और रोज़गार के साथ मज़दूरों की उचित ट्रेनिंग की सुविधा उपलब्ध न कराये जाने की भी नाराज़गी देखने को मिली हैं। मौजूदा सांसद की जनता में उपश्थित न होना भी अक्षय यादव को कमज़ोर करता हैं। शिवपाल यादव को मुलायम के बाद यादवों और समाजवादियों का बड़ा नेता माना गया हैं और किसानों, मज़दूरों और उपेक्षितों के लिए किये गए उन के आन्दोलनों ने उन को एक बड़ा नेता बनाया हैं। जसवंत नगर विधान सभी क्षेत्र का विकास शिवपाल के लिए उम्मीद का एक आइना हैं। यादव और मुस्लिम वोट के बटवारे के बाद जाटव वोट का भी बड़ा हिस्सा शिवपाल के खाते में जा सकता हैं क्यूंकि उन्हें सपा बसपा का यह गठबंधन पसंद नहीं हैं। बीते वर्षों में जो कार्यकर्त्ता एक दूसरे के प्रतिद्वंदी थे, आज एक साथ काम कर रहे हैं और कल फिर से अलग होना पद सकता हैं। इन तमाम नाराज़गियों के अलावा यूपी और दिल्ली सर्कार से नाराज़ जनता को भी शिवपाल एक विकल्प नज़र आ रहे हैं क्यूंकि गठबंधन की कमज़ोरी के बाद अगर वोट को बिखरा दिया गया तो बीजेपी को फायदा मिल सकता हैं इस लिए लोगों को शिवपाल की चाबी में ही उम्मीद नज़र आ रही हैं। हालाँकि रास्ता इतना आसान नहीं हैं लेकिन अब तक चुनावी ज़मीन शिवपाल की तरफ खिंचती नज़र आ रही हैं।