जनवरी 2018 को हुए भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में यलगार परिषद पर आरोप है कि उनके भड़काऊ भाषा के कारण हिंसा भड़की। इसके लिए माओवादी संगठन की भी मदद ली गई. हिंसा में सार्वजनिक और निजी संपत्ति का नुकसान भी हुआ। बता दें कि महाराष्ट्र सरकार ने 25 अक्टूबर को बांबे हाइकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि अगर हाईकोर्ट के आदेश पर रोक नहीं लगाई गई तो हिंसा के मामले में आरोपी तय वक्त में आरोप पत्र दायर न हो पाने के चलते जमानत के हकदार होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने भीमा कोरेगांव मामले में आरोपी 5 सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने के लिए अतिरिक्त वक्त देने से इनकार कर दिया। कोर्ट का कहना है कि तय दिनों में चार्जशीट दाखिल ना करने पर भीमा कोरेगांव हिंसा के आरोपी बाइडिफ़ॉल्ट जमानत के हकदार नहीं होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 10 जनवरी को बांबे हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार की याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया था।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अब वकील सुरेंद्र गडलिंग, प्रोफेसर शोमा सेन, दलित कार्यकर्ता सुधीर धवले, सामाजिक कार्यकर्ता महेश राउत और केरल की रोना विल्सन को जेल भी रहना होगा। हालांकि, अब आरोपी निचली अदालत में जमानत याचिका दाखिल कर सकते हैं। इस फैसले के पहले सुप्रीम कोर्ट ने भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में आरोपी आनंद तेलतुंबडे के खिलाफ एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में वह दखल नहीं दे सकता है. क्योंकि यह मामला शुरुआती दौर में है।