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नई दिल्ली, 18 मई 2020, (आरएनआई)। देश की आबादी करीब सवा अरब है। इस आबादी का 37 फ़ीसदी हिस्सा मज़दूरी के लिए पलायन करने को मजबूर है। 37 फ़ीसदी के हिसाब से मज़दूरों की ये तादाद क़रीब 46 करोड़ 25 लाख के आस-पास बैठती है।

अब जबकि कोरोना की महामारी ने सांसें अटका दी हैं, यही बेचारे मज़दूर कोरोना से नहीं, बल्कि भूख से बचने के लिए अपने-अपने गांवों की और फिर से पलायन करने लगे हैं।

मजदूरों की ये हालत देख कर हर कोई तकलीफ़ में है। अपने-अपने हिसाब से हर कोई सिस्टम को और ख़ास कर सरकार को कोस रहा है। अच्छा है। कोसना भी चाहिए। इन्हीं मजदूरों समेत बाक़ी लोगों का वोट बटोर कर जो लोग सत्ता में आए, उनकी ज़िम्मेदारी और जवाबदेही तो बनती ही है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे देश में मजदूरों की ये हालत क्यों हो गई? क्यों ग़रीब और ग़रीब होते गए? क्यों अमीरों की अमीरी लगातार बढ़ती रही? किसने इन मजदूरों को ताउम्र पुश्त-दर-पुश्त हाशिये पर रखा?

अब क्यों लाख कोशिशों के बावजूद पलायन कर रहे मजदूरों का पेट भरने में सरकारों से लेकर आम लोग तक हर कोई नाकाम हो रहा है? क्यों पूरा का पूरा सरकारी तंत्र इन्हें घर भिजवाने के मामले में फेल होकर रह गया है?

तो सुनिए… जवाब है- हमारी आबादी। लाचार और बेबस लोगों की तादाद अगर लाखों में होती, तो भी गनीमत थी। लेकिन यहां तो करीब आधे अरब के आस-पास लोग लाचार और बेबस हैं।

जब देश की लगभग आधी आबादी लाचार और बेबस होगी, तो भला इतने लोगों को कोई भी सरकार, संस्था या व्यक्ति कैसे संभाल सकता है? सच्चाई तो ये है कि अब तक हम सभी ने देश की भयानक तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या की सिर्फ़ और सिर्फ़ अनदेखी की है।

सियासी पार्टियों की तो बात ही छोड़िए। कई तो ऐसी हैं, जो विदेशी शरणार्थियों और दुश्मनों को भी अपनी ज़मीन पर सिर्फ़ इसलिए बसा लेना चाहती हैं कि उनका वोट बैंक बरकरार रहे और बढ़ता रहे।

और हम??? सेर-सवा सेर आटा-चावल और दारु का पव्वे पर हर चुनाव में सदियों से बिकते आए हैं और शायद आगे भी बिकेंगे। हमने एकजुट होकर कभी हमारे राजनेताओं को इस भयानक जनसंख्या के लिए कटघरे में लाने की कोशिश ही नहीं की। तो अब भुगतेगा कौन?

(सुप्रतिम बनर्जी)