330 Views

उत्तर प्रदेश की सियासत में उठा पटक का दौर चल रहा है एक ओर सत्ता में बैठे योगी आदित्यनाथ हैं जो लगातार जनता को कड़वी दवा पिलाने पर तुले हैं चाहे वह महंगी बिजली हो या फिर दिन प्रतिदिन बिगड़ती कानून व्यवस्था वहीं उनके सामने खामोश विपक्ष के तौर पर बहुजन समाज पार्टी को कभी भी सड़क पर उतर कर प्रदर्शन करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई सिर्फ बहनजी की सभाओं को सफल बनाने के और दूसरी ओर जवानी कुर्बान गैंग के सिपहसालार मिस्टर मुस्कान अखिलेश यादव की पार्टी समाजवादी अखिलेश यादव की पार्टी कहना इसलिए उचित है क्योंकि मुलायम की समाजवादी टी हल्ला बोल के लिए जानी जाती थी लेकिन अब इस दल का चरित्र बदल चुका है ,आलीशान पार्टी ऑफिस में प्रेस कांफ्रेंस और प्रदर्शनों से दूरी ने इस पार्टी को चाटुकारों की सबसे प्रिय जगह बना दिया है।

मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव

समाजवादी पार्टी भी सरकारी फरमानों पर चुप साधे है जैसे उनका मानना हो की एक चुप हज़ार बला टालती है,अब पता नहीं यह कौन सी बला को टालने के लिए है अब बची कांग्रेस जो अटकलों पर जीवित है अभी लगता है चिदंबरम के शोक में है इसीलिए सिर्फ प्रियंका गांधी से आस लगाए बैठी है यानी जिन्हें जनता विपक्ष मान रही थी सब मुंह में दही जमाए बैठे हैं ऐसे में अपना अलग दल बना चुके शिवपाल यादव ने सड़क का रुख कर दिया है और उनके सड़क पर आते ही अखिलेश यादव की नींद उड़ गई है क्योंकि शिवपाल यादव ने प्रदेश के हर जिले मुख्यालय पर सरकार की गलत नीतियों के विरूद्ध धरना करने का जो आह्वाहन किया उसमें हर जगह भारी भीड़ दिखी जिसने खुद को विपक्ष समझ रहे दलों की छातियों पर सांप लोटा दिए।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलश यादव

अभी हाल ही में अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष को शिवपाल यादव की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की याचिका दी है उसके फौरन बाद शिवपाल का यह शक्ति प्रदर्शन एक नए युग की आहट दे रहा है ,शिवपाल ने जो रणनीति अपनाई है उससे सफलता मिलनी निश्चित है उन्होंने मुसलमानों को उचित स्थान दिया है तो दलितों को भी सम्मान दिया है पिछड़ा समाज की ओर उनका रुझान और फिर आसानी से उनकी उपलब्धता ने एक नई कहानी की शुरुवात कर दी है।

शिवपाल की सहजता एवं सौम्य व्यक्तित्व उनकी बड़ी ताकत है अब वह सड़क का रुख कर थाना तहसील स्थल पर होने वाले कार्यक्रमों में शामिल होने की रणनीति बना रहे है,जिस प्रकार आगरा आजमगढ़ लखनऊ इटावा,मैनपुरी,सुल्तानपुर जैसी जगहों पर प्रदर्शन हुआ उसने पुराने समाजवादी दौर की यादे ताज़ा की और साफ संदेश दिया कि मुलायम के सच्चे सियासी उत्तराधिकारी शिवपाल ही हैं जो ज़मीनी लड़ाई लड़ेंगे।
वैसे भी जिस प्रकार उत्तर प्रदेश के बंटवारे की खबरे हवा में तैर रही हैं तो अगर ऐसा बंटवारा होता है तो शिवपाल ज़्यादा ताकतवर बन कर निकलेंगे ,

शिवपाल यादव ने धरने पर कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए जो बड़ी बात कही कि अब वह सड़क पर आ गए हैं और जनता की लड़ाई लड़ने के लिए उन्हें समस्याओं से निजात दिलाने के लिए कमर कस ली है उसने साफ संकेत दिया कि अब मिस्टर मुस्कान की मुसीबतें और बढ़ने वाली हैं,अगर उत्तर प्रदेश बंटता है तो शिवपाल के बिना सत्ता में किसी के आने की संभावना नहीं होगी और यदि संघर्ष जारी रहता है तो मुख्यमंत्री की कुर्सी भी बहुत दूर नहीं होगी।
इटावा में शिवपाल यादव की पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौतम राणे सागर ने पार्टी की जो आगे की योजना बताई उससे साफ है कि अब 2019 लोकसभा चुनाव के सदमे को पीछे छोड़ लक्ष्य 2022 की तरफ तेजी से प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया ने रुख कर लिया है अब देखना यह है कि ऊंट किस करवट बैठेगा। शिवपाल के शक्ति प्रदर्शन के बाद जब उनसे परिवार के एक होने के संबंध में प्रश्न किया गया तो उन्होंने साफ कहा कि परिवार में एकता होने की गुंजाइश है लेकिन कुछ लोग साजिश कर एक नहीं होने देना चाहते यहां एक बात गौर करने की है कि शिवपाल ने परिवार की एकता की बात कही है इसे समझना होगा कि क्या इसका मतलब पार्टी से भी है या फिर सिर्फ मामला परिवार तक का है?
लेकिन शिवपाल के इस बयान के बाद अखिलेश ने जो कहा उससे तो जो संकेत मिले वह यहीं कहते हैं कि कुछ तो पर्दे के पीछे है ,अखिलेश ने कहा कि जो पार्टी में आना चाहें उसे में आंख मूंद कर पार्टी में शामिल करूंगा सबके लिए दरवाजे खुले हैं इस बयान को अखिलेश की नरमी के तौर पर देखा जा रहा है लेकिन इसे घोर राजनैतिक बयान भी माना जा सकता है क्योंकि अखिलेश ने चाचा का और परिवार का नाम लिए बिना यह बात कही है।

उधर शिवपाल ने आज़म ख़ान का बचाव करते हुए जो बयान दिया उससे रामगोपाल यादव की चिंता बढ़ती दिख रही है,क्योंकि अगर आज़म और शिवपाल की इस समय नजदीकी बढ़ती है तो अखिलेश को शिवपाल के साथ खड़ा होना होगा और रामगोपाल को बाहर का रास्ता दिखाना पड़ेगा यानी एक बड़ा राजनैतिक घटनाक्रम मुहाने पर आ खड़ा हुआ है,हालांकि अभी दोनों तरफ से कोई स्पष्ट संकेत नहीं है लेकिन खबर आग की तरह फैल रही है तो कुछ तो ज़रूर चल रहा है क्योंकि उपचुनावों की तारीख भी घोषित हो चुकी है अगर इसमें समाजवादी का प्रदर्शन खराब होता है तो 2022 की संभावनाओं को ग्रहण लग जायेगा लिहाज़ा अगर दोनों चाचा भतीजा एक नहीं भी होते हैं तो मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं अगर ऐसा हो जाता है तो परिणाम बेहतर होने की उम्मीद की जा सकती है वैसे चाचा ने शक्ति प्रदर्शन में पहले ही बाज़ी मार ली है अब देखिए होता है क्या?