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कोलकाता। भगवा खेमा बंगल मिशन के तहत आगे बढ़ रही है।  पिछले साल संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने राज्य की 42 में से 18 सीटों पर जीत दर्ज कर सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस को करारा आघात दिया था। हालांकि राज्य के दूसरे हिस्सों में शानदार प्रदर्शन के बावजूद राजधानी कोलकाता में भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा था। यहां उत्तर से लेकर दक्षिण तक सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में ही मतदान हुए थे।

अब एक साल बाद विधानसभा का चुनाव है और भाजपा राज्य की सत्ता पर आरूढ़ होने की रणनीति के साथ कमर कस चुकी है। लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव में कोलकाता में खराब प्रदर्शन ना हो, इसलिए पार्टी ने विशेष रणनीति अपनाई है। अब तक ऐसा होता रहा है कोलकाता के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सांगठनिक प्रभार की जिम्मेवारी हिंदी भाषी नेताओं के हाथों सौंपी जाती रही थी लेकिन अब बांग्ला भाषी लोगों को पार्टी का चेहरा बनाया जा रहा है।

जिस तरह बिहार में जाति के आधार पर लामबंदी होती रही है उसी तरह से पश्चिम बंगाल में भी भाषाई भावनात्मक जुड़ाव हमेशा से रहा है। इसलिए पार्टी ने कोलकाता के प्रमुख सांगठनिक जिलों में चेहरा बदला है। दो जिलों के अध्यक्षों को बदल दिया गया है। नॉर्थ कोलकाता की जिम्मेवारी हिंदी भाषी दिनेश पांडे के हाथ में थी, लेकिन अब उन्हें हटाकर शिवाजी सिंह रॉय को नॉर्थ कोलकाता का अध्यक्ष बनाया गया है।

करीब एक साल पहले शिवाजी सिंह रॉय ने कांग्रेस छोड़ कर तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया था। लेकिन 5 महीने पहले उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का भी साथ छोड़ दिया और भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ले ली। अब उन्हें उत्तर कोलकाता भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया है। माना जा रहा है कि इससे क्षेत्र में रहने वाले बांग्ला भाषी लोगों के बीच पार्टी की पैठ बनेगी। इसी तरह से दक्षिण कोलकाता में भी बदलाव किया गया है।

यहां मोहन राव को हटा कर सोमनाथ बनर्जी को दक्षिण कोलकाता जिला अध्यक्ष बनाया गया है। सोमनाथ बनर्जी पहले से ही साउथ सबर्बन के अध्यक्ष हैं। अब उन्हें साउथ कोलकाता की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई है। दरअसल मोहन राव बांग्ला भाषी नहीं है और सेवानिवृत्त सैनिक हैं। हाल ही में जब सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक सब्यसाची दत्त ने भाजपा की सदस्यता ली थी तब से लेकर दत्त के साथ राव के संपर्क अच्छे नहीं रहे हैं।

माना जा रहा है कि उन्हें हटाए जाने के पीछे यह भी एक वजह है। अब जबकि सोमनाथ बनर्जी को दक्षिण कोलकाता की जिम्मेवारी दी गई है तो माना जा रहा है कि इस क्षेत्र में भी रहने वाले बांग्ला भाषी लोगों तक पहुंचने में भाजपा को सुविधा होगी। हालांकि अंदर खाने इस तरह की भी चर्चा है कि इस बदलाव से हिंदी भाषी कार्यकर्ताओं में नाराजगी है। वह भी तब जब केवल उन लोगों को जिम्मेवारी दी जा रही है जो दूसरी पार्टियों को छोड़कर भाजपा में आए थे।

पुराने कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर बांग्ला भाषी लोगों को ही जिम्मेवारी दी जानी थी तो कई सारे भाजपा के पुराने और दिग्गज नेता थे, जिन्हें अध्यक्ष बनाया जा सकता था। लेकिन जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस और अन्य पार्टियों से आए हुए लोगों को जिम्मेवारी दी जा रही है, उससे ऐसा लगता है जैसे पार्टी बैक डोर से तृणमूल के शागिर्दों के हाथों में ही जा रही है।