दिल्ली-
दिल्ली के जाफराबाद सीलमपुर से इस की शुरुवात हो चुकी है। पुलिस के साथ दंगाई घूम रहे हैं। दंगाई गोली पत्थर चला रहे हैं और पुलिस भी उन के साथ मिल कर गोली पत्थर चला रही है। टायर मार्केट में दुकानों में बसों में पेट्रोल पंप में और घरों में आगज़नी की गई है। आसू गैस के गोले छोड़े गए हैं। घरों के दरवाज़े तोड़े गए हैं। हलाक होने वालों में से एक को दंगाईयों ने लाठी डंडों से पिट कर मार डाला। पुलिस कर्मी किस तरह हलाक हुआ ये अभी साफ नहीं है।

दंगों में दो गुट आमने सामने हैं। ये कहना ज़्यादा बेहतर होगा के दूसरा गुट जबरन पहले गुट के सामने आ कर खड़ा हुआ। पहला गुट नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर रहा था जिस के लिए उन्होंने रास्ता रोका था। रास्ता रोक कर प्रदर्शन करना भारत में एक आम तरीका है क्यों के भारतीय लोकतंत्र में सरकारें विरोधों का स्वागत नहीं करती हैं और इसलिए वो जनता को कोई एक खास जगह बना कर नहीं देती हैं जहां जनता अपना विरोध प्रदर्शन कर सके। धरना प्रदर्शन के लिए जगह की ग़ैर दस्तियाबी सिर्फ दिल्ली में ही नहीं बल्कि भारत के हर राज्य में है।

रास्ता रोक कर अपने ही इलाक़े में प्रदर्शन करने का एक कारण सुरक्षा की भावना भी होती है क्यों के जनता को सरकारों पर इतना भरोसा नहीं होता है के सरकारें धरना प्रदर्शन के वक़्त उन की हिफाज़त का मुनासिब और मुकम्मल इंतज़ाम करेगी। होना तो ये चाहिए के सरकारों को हर धरना प्रदर्शनकारी की हिफाज़त करनी चाहिए ताकि सरकार पर ये इल्ज़ाम ना लगे के सरकार ने जानबूझ कर प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा में चूक की जिस से ये भी पैग़ाम जाता है के सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों की क़दर नहीं करती है और लोकतंत्र में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए सरकार की बदनामी होती है।

अब सवाल ये है के क्या किसी भी गुट को सरकार और किसी सरकारी फरमान के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों के खिलाफ खड़ा होना चाहिए? जवाब है बिल्कुल नहीं। प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार है जो लोकतंत्र में ना तो कोई नागरिक और ना ही कोई सरकारी संस्था इस में बाधा बनने का अधिकार रखता है और ना ही इस का हनन कर सकता है।

अगर किसी को किसी के विरोध के खिलाफ खड़े होने का अधिकार नहीं है तो फिर ऐसा क्यों हुआ? ऐसा क्यों हुआ के एक गुट एक सरकारी फ़ैसले के समर्थन में विरोध करने वाले गुट पर हमलावर हो गया। ऐसा क्यों हुआ के सरकारी फ़ैसले के समर्थकों ने खुद को राष्ट्र का समर्थक बताया और विरोध करने वालों को राष्ट्र विरोधी? क्यों के हमारे लोकतंत्र में सरकार और राष्ट्र को बराबर मान लिया गया। ऐसा इसलिए हुआ क्यों के सरकारें अब हमारी और तुम्हारी के दो पाटों में बंट गई हैं।

प्रीठभूमी
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भारतीय लोकतंत्र हमेशा से धर्मांधता के वार को झेलता रहा है। भारतीय लोकतंत्र हमेशा से जातीय संघर्ष की चोट खाता रहा है। भारतीय लोकतंत्र पर हमेशा से धर्म और जात का खतरा बना रहा। ये जरासीम लोकतंत्र के जिस्म में हमेशा से मौजूद रहे और जैसी ही लोकतंत्र की सहन शक्ति कमज़ोर हुई ये जरासीम एक बीमारी की शक्ल में पूरे जिस्म पर फोड़ा बन कर उभरने लगा। इस फोड़ों की जड़ें जिस्म की कोशिकाओं में बहुत अंदर तक धंसी हुईं हैं और एक लाईलाज बीमारी की तरफ अग्रसर है।

इस की बहुत सी ऐतिहासिक वजहें हैं, वोट बैंक की राजनीति, जाती की राजनीति, धर्म की राजनीति, वर्ग की राजनीति, ज़बान की राजनीति और ऐसी तमाम चीजें जो समाज में बिखराव पैदा करती हैं। एक वजह और रही, गुंडों का राजनेता बनना। आज़ादी के बाद एक समाजवादी व्यवस्था कि कामना की गई जिस पर सब से पहले चोट गांधी को मार कर किया गया और फिर उन को मारने वाले व्यक्ति और आदर्श की महिमामंडन की गई। गांधी को मारने वाले वाले संस्था पर बैन लगाया गया फिर उस बैन को हटा लिया गया और अप्रत्यक्ष रूप से गांधी की हत्या को सही ठहरा दिया गया। वक़्त के साथ नेताओं ने लठैत पालने शुरू किए और फिर यही लठैत राजनेता बन बैठे और हर क्षेत्र में इन का हस्तक्षेप होने लगा।

हम ने गुंडों की महिमा मंडन शुरू कर दी और उन को सामाजिक स्वीकृति दे दी। गुंडे जमींदार जिन के ज़ुल्म से इतिहास पटा पड़ा है उन को विधान सभाओं और लोक सभा में बिठा दिया। जो कल जमींदार राजा गुंडे थे आज राजनेता बन गए और जनता दांत बिसोर के उन्हें देखती रही। समाज के पिछड़े दबे कुचले वर्ग को राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं मिल पाई। इस सामाजिक समावेश की कमी का एक अध्याय आरक्षण भी रहा जिस को पिछड़ों के खिलाफ एक हथियार के तौर इस्तमाल किया गया।

भारतीय समाज के इन दीमकों का जब पेट इतने मात्र से नहीं भरा तो इन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा पूंजीवाद की तरफ मोड़ दिया। और जब धार्मिक राजनीति और पूंजीवाद का मिश्रण हुआ तो ये कैंसर से भी घातक हो गया। इन्होंने ने पूरे समाज को बाज़ार में तब्दील करना शुरू कर दिया। इसी क्रम में लोकतंत्र की मृत शहीर की ताबूत में आखरी किल ठोंकी गई जब बाबरी मस्जिद को गिराया गया। ये घिनौना कृत सिर्फ इसलिए नहीं था के किसी ने किसी की ज़मीन क़ब्जा कर के उस पार मस्जिद बनाई थी बल्कि वो लोकतंत्र को एक खुली चुनौती थी जिस में लोकतंत्र हार गया। इस बात का मतलब ये बिल्कुल नहीं है के मस्जिद की तरफदारी की जा रही है बल्कि ये बात बहुजनों और मूलनिवासियों के लिए एक इशारा था के अब लोकतंत्र नहीं है।

इस ताबूत पर कील ठोकने के बाद उस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगाई जिस के अतत मस्जिद को गिराने वालों को आज तक सज़ा नहीं मिल पाई। इस के विपरित देश के अल्पसंख्यकों और पिछड़ों को निशाना बनाया जाने लगा। मौखिक तौर पर दलित पिछड़ों को हिन्दू तो कहा गया लेकिन कभी माना नहीं गया। मुसलमानों को विदेशी आक्रांता बता कर हाशिए पर डालने की कवायद शुरू हुई। उन को जबरन शहर से हट अपनी अलग आबादी बसाने पर मजबूर किया गया। उन के इलाकों को घेट्टो में तब्दील कर दिया गया।

जहां आज उन के जीने का हर सामान मौजूद है लेकिन फिर भी वो मेन स्ट्रीम भारतीय समाज से दूर होता चला गया। उसी घेट्टो में उन के सपने पलने लगे उन की ज़िंदगियां चलने लगी। वो उसी घेट्टो में पैदा होने लगे जीने मारने लगे प्यार मोहब्बत करने लगे और सियासत भी करने लगे। उन के अंदर ये मुस्लिम लीडरशिप की सोच पनपने लगी और इस में फायदा चंद एलीट मुसलमानों का हुआ। दलितों और पिछड़ों के हालात में भी लगातर गिरावट आती रही। हिन्दू समाज का सवर्ण तबका लगातर आर्थिक और सामाजिक तरक्की हासिल करता गया और पिछड़े वही के वही रह गए।

मौखिक तौर हिन्दू कहे जाने पिछड़े भी नालियों और नलों के किनारे शहर से बाहर बसने को मजबूर रहे। उन को आरक्षण के नाम पर ठगा गया। उन के साथ उच्च नौकरियों में बेईमानी की गई और उन को अमानवीय कार्य करने पर मजबूर किया गया। बीच बीच में दलित उत्थान के नारे लगे और मुसलमानों कि स्तिथि सुधारने की बात की गई। मज़ेदार ये है के नारे लगाने वाले और उत्थान कि आवाज़ देने वाले भी यही अघाए उच्च वर्ग ही रहे। ये अलग बात है के उत्थान हो नहीं पाया क्यों की जिस टेबल पर उत्थान कि रणनीति बनती है उस टेबल पर कोई दलित पिछड़ा नहीं था। इन के नाम पर योजनाएं बनने लगीं और भ्रष्टाचार होता रहा।

हाल
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लोकतंत्र को खत्म कर के अघोषित राजशाही या हिटलरशाही राज स्थापित करने के लिए मौजूदा परिपेक्ष में नागरिकता संशोधन बिल लाया गया और नागरिकता संशोधन कानून बनाया गया। मुझे ये कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी के एक दिन ऐसा आएगा जब दलित पिछड़ा मुसलमान तबका शरणार्थी मात्र बन कर रह जाएंगे और उन से उन के वोट का हक छीन लिया जाएगा जो गोलवलकर और दूसरे आरएसएस के गुरुओं की हिन्दू राष्ट्र की परिभाषा है।

और जब एक बार इन के वोट का अधिकार छिन जाएगा तो फिर इन के साथ क्या कुछ होगा वो सिहरन पैदा करने वाला है। चतुर्थ वर्ण व्यवस्था की झाकियां हम ने देखीं हैं वो इतनी ख़तरनाक हैं तो मुकम्मल तौर पर चतुर्थ वर्ण व्यवस्था कैसी होगी ये सोच के भी परे है। और इस चतुर्थ वर्ण व्यवस्था को लागू कराने में हर सरकारी तंत्र शामिल है फिर चाहे वो भारतीय न्याय व्यवस्था ही क्यों ना हो।

इस का उदाहरण ये है के शाहीन बाग़ की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ एक लाइन ये कह कर के विरोध प्रदर्शन एक अधिकार है किनारा कर लिया और सारा फोकस सड़क को बना दिया गया। सड़क देश और जनता के लिए है जनता और देश सड़क के लिए नहीं है। दूसरी बात सुप्रीम कोर्ट ने ये नहीं सुझाया के प्रदर्शन कारियों को कहां प्रदर्शन करना चाहिए और ना पुलिस विभाग से ये कहा के इन की हिफाज़त का बंदोबस्त करे। आज इसी परिपेक्ष में लोग इस क़ानून के खिलाफ सड़कों पर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं।

अब आते हैं आज के दंगे की फौरी वजह पर। दो दिन पहले भाजपा के एक नेता जिस के साथ पुलिस भी खड़ी थी ये कह रहे थे के पुलिस तीन दिन के अंदर प्रदर्शन कारीयों को हटाए वरना हम पुलिस की भी नहीं सुनेंगे। पुलिस ये सब सुनती रही जब के कायदे से उस नेता को उसी वक़्त घसीट कर थाने ले जाना चाहिए था क्यों के ये हेट स्पीच और दंगा भड़काने वाला भाषण दोनों था।

लेकिन पुलिस ने उस का साथ दिया। सरकार का काम होता है के जो उन से मतभेद रखते हैं उन से तर्क करना चाहे संसद के अंदर या संसद के बाहर। लेकिन ये तब होता है जब लोकतंत्र बहाल हो। इसी के साथ साथ दिल्ली के जामा मस्जिद के इमाम ये बयान देता है के इस कानून से मुसलमानों का कोई नुक्सान नहीं है लेकिन वो ये नहीं बताता है के कैसे नुकसान नहीं है। आज के दंगे के ज़िम्मेदार प्रत्यक्ष रूप से ये दोनों ही हैं।

जब तक ये पोस्ट लिखी जा रही है तब तक और ना जाने कितने जाफराबाद की तयारी हो रही होगी कितने मंसूबे बन रहे होंगे कितने हिन्दू राष्ट्र के मीडिया प्रवक्ता तथ्यों का गला मरोड़ रहे होंगे कितने सरकार के समर्थक इस हिंसा के समर्थन में तर्क दे रहे होंगे कितनी सरकारी एजेंसियां जेनोसाइड की तयारी में लगी हुई होंगी।

– इसरार वारसी