अन्तराष्ट्रीय संबंधों और राजनीति के लिए यह बहुत कठिन समय है.किसी भी देश या शक्ति के लिए यह समय फालतू बातों में उलझने का नहीं है.तत्परता और चहल पहल से लग रहा है कि भारत सरकार भी टेंशन में है और केवल भारत नही बल्कि हर मुल्क टेंशन में हैं. मंगलवार रात को ईरान ने इराक़ स्तिथ अमेरिकी केम्पों पर जवाबी हमला किया.जिसमें अनुमान है कि अमेरिका को भारी नुक़सान हुआ.
वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरानी जनरल मेजर क़ासिम सुलेमानी पर हमला करके मानों ‘बारुद में माचिस खेंच दी है’.ट्रम्प को शायद यह नही मालूम कि जंग शुरु हूई तो किधर भी जा सकती है और ट्रम्प को इतना भी ख़याल नही कि ऐसी जंग मैं हार जीत नहीं होती,केवल तबाही होती है और वो चारों तरफ होगी.
हालांकि अमेरिका अपनी बदमाशी अर्थात अस्तित्व की यह आखरी लड़ाई लड़ रहा है या तो उसकी बदमाशी खत्म होगी या फिर पूरा खित्ता चटियल मैदान बन जायेगा.इसके बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी कि एक बार जंग शुरू हुई तो किस रुख बैठेगी क्योंकि यह जंग ईरान अकेला नहीं लड़ेगा.इस बात को अमेरिका जितनी जल्दी समझ ले उतना अच्छा है.
इस मुद्दे पर ईरान सहयोगी चीन ने बयान जारी किया है के पिछले दिनों चीन रुस ओर ईरान का नेवल एक्सरसाइज़(सैन्य अभ्यास) कोई खेल नहीं था.यह बड़ा इशारा है कि ऐसे हालात में चीन ईरान को अकेले नही छोड़ेगा.
वहीं मंगलवार को अचानक रुसी राष्ट्रपति पुतिन सीरिया पहुंचे और वहां रुसी सैनिक बैस कैंप में सीरियन राष्ट्रपति असद से मुलाकात की.जैसे ही इस खबर ने अंतराष्ट्रीय मीडिया में जगह ली.तभी से इस बात का अंदाज़ा लगने लगा था कि अब बम्ब फटने में ज्यादा टाइम नहीं बचा है और देर रात यही हुआ भी.
इसलिए अब भारत सरकार को भी चाहिए कि अमेरिका से दूरी बनाकर रखे.अमेरिका इस समय अपने लिये अड्डे तलाश रहा है और वह भारत को लालच देकर ऐसा करने की कोशिश करेगा और भारत को लालच में न आकर स्तिथि को समझना चाहिए कि अमेरिका ईरान से अधिक दूरी पर है और भारत गल्फ का पड़ोसी हैं.वैसे भी अमेरिका किसी का सगा नही है और भारतीय रणनीतिकारों को मंथन करना चाहिए.
वैसे भी हम अपने कागज़ात ढूढ़ने में लगे है और आर्थिक मुद्दे पर भी परेशान है.ऐसे में मुश्किलें बढ़ाने की कोई जल्दबाज़ी न करके आराम से फैसला लें तो भारत के लिए बेहतर होगा क्योंकि पहले ही मौजूदा भारत सरकार की साख अंतराष्ट्रीय स्तर पर काफी आलोचना झेल रही है.
(हसन हैदर)