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आओ ये अहद करें मिल कर
हम देश बचा कर दम लेंगे
इन चोरों और लुटेरों से
इन बर्बर तानाशाहों से
अय्यारों से मक्कारों से
इन रात के पहरेदारों से
काली मसमूम हवाओं से
नफ़रत के भड़कते शोलों से
इन वहशी आदमख़ोरों से
इन फन फेलाते नागों से
और ज़हर उगलते साँपों से
खादी में लिपटे जा़गो़ं से
खा़की के खू़नी इरादों से
हम देश बचा कर दम लेंगे

क्यों खौ़फ़ के बादल मण्डराएँ
जु़ल्मत के निशाँ क्यों लहराएँ
क्यों मौत से पहले मर जाएँ
क्यों मौत के डर से घबराएँ
कब तक ये झूटी आशाएँ
कब तक ज़ख़्मों को सहलाएँ
वो चाहे जो अब फ़रमाएँ
कितना भी हम को बहलाएँ
अब सोच लिया है और नहीं
उनकी मनमानी और नहीं
उनकी तुग़यानी और नहीं
आँखों में आँसू और नहीं
ये काला जादू और नहीं
ख़्वाबों के लाशे और नहीं
हर रोज़ जनाजे़ और नहीं
ये झूटे वादे और नहीं
रँगीन दिलासे और नहीं
ये खू़नी मंज़र और नहीं
सीनों में ख़ंजर और नहीं
ये हू का आलम और नहीं
गलियों में मातम और नहीं
आसेबी मौसम और नहीं
और जु़ल्म का परचम और नहीं

हक़ का परचम लहराएँगे
बातिल को धूल चटाएँगे
मक़तल को रँगीं कर देंगे
हाँ देश बचा कर दम लेंगे

मुत्तलिब मिर्ज़ा