सुलतानपुर, 31 मई (आरएनआई) | धमकी के मामले में पांच वर्ष पूर्व ही आरोपी साक्ष्य के अभाव में बरी हो गया,लेकिन उसका रिहाई आदेश अटका रहा। नतीजतन वह बरी होने के बाद भी पांच वर्षों तक इस मामले में जेल काटता रहा। जेल प्रशासन ने चार वर्षों तक कोर्ट से कोई पत्राचार भी करना मुनासिब नहीं समझा। मामला कोर्ट के संज्ञान में लाया गया तो जिला जज के आदेश पर सीजेएम ने जेल अधीक्षक से रिपोर्ट तलब करने के बाद रिहाई आदेश जारी किया।

मामला हलियापुर थाना क्षेत्र के जरई खुर्द मौजा जरई कला से जुड़ा है। जहां के रहने वाले राजेश पाठक ने 20 अगस्त 2011 की घटना बताते हुए अदालत में आरोपियों के खिलाफ अभियोग दर्ज कराया। आरोप के मुताबिक उसके गांव के ही राम अभिलाख सिंह के यहां आरोपीगण अनंत कुमार सिंह व बृजेश सिंह निवासीगण विशम्भर पट्टी-बाजार शुकुल का ननिहाल है। आरोप के मुताबिक इन दोनों आरोपियों से गांव के ही रामकरन सिंह जेल में मुलाकात करने गये थे तो उसी दौरान आरोपियों ने अभियोगी को आबादी की जमीन से कब्जा हटाने को लेकर जान से मारने की धमकी दी थी आैर अभद्र भाषा का प्रयोग भी किया था। इस बात को रामकरन सिंह ने जेल से लौटने पर अभियोगी को बतायी थी।

आरोप है कि स्थानीय पुलिस व एसपी के यहां शिकायत के बाद भी कार्यवाही न होने पर अभियोगी ने कोर्ट की शरण ली। इस मामले में राजेश पाठक की अर्जी पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने आरोपियों को विचारण के लिए तलब करने का आदेश जारी किया। इस दौरान दोनों आरोपी गैंगस्टर के मामले में जेल में निरुद्ध रहें,जिसका हवाला देते हुए अभियोगी ने कोर्ट से अपने मामले में दोनों आरोपियो को जेल से तलब करने की मांग की। कोर्ट के आदेश पर अनंत व बृजेश सिंह जेल से तलब हुए आैर अन्य मामलों के अलावा उनकी रिमांड पेशी इस मामले में भी चलने लगी। दौरान विचारण अनंत कुमार सिंंह को अन्य मामलों एवं इस मामले में भी जमानत मिल गयी। जिसके चलते वह रिहा हो गया,जबकि आरोपी बृजेश सिंह अन्य मामलों में जमानत न पाने के कारण जेल में निरुद्ध रहा एवं इस मामले में भी जमानत नहीं कराया।

नतीजतन बृजेश सिंह संबंधित अदालत में लगातार पेशियों पर तलब होता रहा। इस मामले का विचारण पूर्ण होने के उपरांत साक्ष्य के अभाव में मुकदमे की सुनवाई कर रहे न्यायिक मजिस्ट्रेट/सिविल जज चतुर्थ विजय कुमार विश्वकर्मा ने दोनों आरोपियों को 12 जून 2015 को दोषमुक्त करार दिया। फिलहाल दोषमुक्त बृजेश सिंह का रिहाई आदेश नहीं जा सका। जिसके उपरांत अन्य मामलों में जमानत न पाने के कारण बृजेश सिंह जेल में निरुद्ध रहा,लेकिन इस मामले में बरी होने के कारण चल रही रिमांड पेशी पर बृजेश की तलबी नहीं हुई। यह स्थिति बरी होने के बाद करीब पांच वर्षों तक बनी रही,लेकिन जेल प्रशासन ने कभी भी न तो बृजेश सिंह की तलबी न होने के विषय में वजह जाननी चाही आैर न ही संबंधित कोर्ट से किसी प्रकार का पत्राचार किया।

अन्य मामलों में जमानत पाने व बरी होने के बाद सभी मुकदमों में जब बृजेश सिंह की रिहाई हो गयी तो इस मामले में बृजेश का वारंट बरकरार रहने की वजह से रिहाई न होने का संकट सामने आया। तब जाकर बृजेश की तरफ से सिविल जज चतुर्थ की अदालत में रिहाई आदेश जारी करने के लिए अर्जी दी गयी। वर्तमान समय में संबंधित अदालत पर फौजदारी का मामला न देखे जाने के चलते न्यायाधीश सिद्धार्थ वर्मा ने यह मामला अपने क्षेत्राधिकार के बाहर बताते हुए सीजेएम आशारानी की अदालत पर प्रेषित कर दिया। मामला पुराना होने के चलते सीजेएम ने जिला जज को प्रकरण से अवगत कराया।

जिसके उपरांत जिला जज ने प्रकरण की सुनवाई कर उचित आदेश पारित करने के लिए सीजेएम को आदेशित किया। तत्पश्चात सीजेएम ने मामले में बृजेश सिंह के खिलाफ चल रहे वारंट को गलत मानते हुए निरस्त कर दिया आैर अन्य किसी मामले में निरुद्ध न रहने की दशा में रिहा करने का आदेश जारी किया। जेल प्रशासन की लापरवाही की वजह से बरी हुए बृजेश सिंह का रिहाई आदेश चार वर्षों तक अटके रहने की वजह सामने आयी।