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कद उस दौर के सारे नेताओं से लंबा। वज़न ऐसा की चलने से ज़मीन धमके।ज़ात वो जो लड़ाका,वहशी। यानि कुल मिलाकर जब चाहे जहाँ चाहे जैसे चाहे ज़ुल्म करने या ज़ुल्म का बदला लेने दोनों की सारी सलाहियत। मगर नहीं उन्होंने अपनाया अहिंसा का रास्ता। इंसानियत,मोहब्बत और ख़ुलूस का रास्ता।अपने महात्मा का रास्ता। अपने पैग़म्बर की मोहब्बत और सादगी का रास्ता । जिन की ज़िन्दगी से खुद गांधी मुतास्सिर हुए । जिनकी खिदमत में गांधी खड़े रहे वो थे खान अब्दुल गफ्फार बादशाह खान। मुल्क बंटने के खिलाफ सबसे तेज़ और कड़ी आवाज़,बादशाह खान ।

जो अपने महात्मा के कहने पर पाकिस्तान चले गए,जहाँ सलाखों और जंज़ीरों से उन्होंने हिंदुस्तान से मोहब्बत का ईनाम पाया।उनमे इतनी ज़हनी और जिस्मानी ताकत थी की वो सलाखें तोड़ देते मगर नहीं आखिर वो महात्मा का हमनाम हो चुके थे, सरहदी गांधी। बेड़ियों ने उनकी खाल को उधेड़ दिया,गोश्त सफ़ेद और लाल रँग के साथ बाहर आगया मगर उफ़ नाकि।बस इतना कहा की मै यहाँ खिदमत के लिए आया हु।इंसानियत की खिदमत।ताउम्र खिदमत की,शराफत,पाकिगज़ी की वो मिसाल रखी जो सरहद के दोनों ओर नही मिलती।दिलों में उतर गए एक एहसास की तरह,दिमागों को बदल दिया एक मोजज़े की तरह।दूर जाने पर भी हिंदुस्तान की रूह में हमेशा के लिए उतर गए।

खान साहब इस दौर की बड़ी ज़रूरत हैं जो अपने कामों से आपके दिल में उतर जाए और इंसानियत व रूहानियत की ऐसी रौशनी जलाए की सारी नफरत ख़ामोशी से निकल जाए।।।आज का दिन उनका है,उनका जन्मदिन हम सबके लिए शपथ का दिन है, ऐसी शपथ जिसमे इंसानियत कायम रखने के लिए आखरी सांस तक जूझने का जज़्बा हो । मज़हब,सोच,संगठन या कोई भी फर्क जो दो इंसानो के बीच दूरी लाता हो उससे हम दूर रहें । खान साहब की तरह अपने आख़री वक़्त तक इंसानियत,मोहब्बत और भाईचारे के लिए जूझ जाएं,यही खुदाई खिदमतगार की निशानी है।

Hafeez Kidwai