इस बात से किसी को इनकार नहीं है कि जो सहिष्णुता और सौहार्द भारत में है वो विश्व भर में कहीं नहीं है। अनेकता में एकता और अखंडता का जो रूप भारतवर्ष की पवित्र धरती पर दिखता है वो किसी भी अन्य देश में नहीं है। इस की एक मूल वजह यह भी नज़र आती है कि इस देश में धर्म, जाति, रंग और नस्ल आदि के रूप में मनुष्य के अनगिनत वर्ग, प्रथा, धर्म, पंथ, विचारधारा, संस्कृति एवं रीति रिवाज मौजूद हैं। यह रंग, रूप, धर्म और जाति की अनेकता भारत के अलावा कहीं और नहीं है। यही वजह है सांप्रदायिक सौहार्द की सब से कड़ी परीक्षा यहीं होती है और बार बार होती है। इस संस्कृति को चोट लगती है। विचारधाराएँ परेशान होती हैं। धर्म दुखी होते हैं। वर्ग आहत होते हैं। लेकिन किसी की हिम्मत नहीं टूटती है और ना ही किसी का हौसला परास्त होता है। विडंबना यह है कि हर बार चोट कोई बाहरी लगाता है लेकिन वह चोट कोई अन्दर वाला अपना लेकर आता है।

20वीं शताब्दी का अंत मुस्लिम कट्टरवाद की छान बीन पर हुआ। 21वीं शताब्दी के पहले दशक तक पूरी दुनिया ने इस षडयंत्र के बारे में जान लिया कि इस्लामी आतंकवाद नहीं है बल्कि मुस्लिम समुदाय के कुछ सरफिरे नौजवान बाहरी साज़िश का शिकार हो कर तथा अनहोनी घटनाओं से प्रभावित हो कर कट्टरवाद के रस्ते पर चल पड़े थे। कुछ ढोंगी मुल्लाओं ने इसे जिहाद का नाम दे कर इसे वास्तविक इस्लाम से जोड़ दिया था।

उन परिस्थितियों का आकलन करें तो हमें पता चलता है कि शुरुआत में जिहाद के नाम पर उस आतंकवाद को चंद मुस्लिम धर्म गुरुओं ने स्वीकार कर लिया था और कुछ लोग ख़ामोश थे उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये। इस स्वीकारता और ख़ामोशी ने उन्हें और निडर बना दिया और देखते देखते यह आतंक फैलने लगा। हालाँकि इस का शिकार सब से ज़यादा ख़ुद मुस्लिम समुदाय हुआ है। लेकिन कहीं ना कहीं यह इस्लाम की छवि ख़राब करने लगा क्यूंकि इस आतंकवादी जिहाद का नारा “अल्लाहु अकबर” था। व्यक्ति विशेष का कर्म होते हुए भी वो धर्म से अलग नहीं रह सका। इस आतंकी जिहाद ने “अल्लाहु अकबर” का अर्थ बदल दिया था। ईश्वर की बड़ाई से ज़्यादा यह आतंक का प्रतीक बनने लगा और लोगों को भयभीत करने के लिए इस का प्रयोग होने लगा। मुस्लिम के अलावा समुदाय में इस शब्द से भय पैदा हुआ और लोग इस से चिढ़ने लगे।

अंततः मुसलमानों को होश आया और लोग खुल कर इस का विरोध करने लगे। कई सामाजिक और धार्मिक

संस्थाओं ने ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार करने की मुहीम चलाई। कुछ वक़्त लगा। कई जानें लेने और बहुत सारी बदनामी और जान व माल के नुकसान के बाद लोगों के आक्रोश को देख कर वो धर्म गुरु भी बोलने लगे जो अब तक ख़ामोश थे। फ़िर उन अरब देशों ने भी स्वीकार किया की आतंकवाद को बढ़ावा देना उन की गलती थी।

आज की परिस्थिति भी लगभग वही है। “अल्लाहु अकबर” की जगह “जय श्री राम” है। यह नारा भी भय का प्रतीक बनता जा रहा है। यहाँ भी धर्म गुरु ख़ामोश हैं।

यह तो सच है कि मर्यादा पुरषोत्तम राम के नाम पर किसी भी प्रकार का अत्याचार या बे कसूर की हत्या राम भक्ति नहीं है जैसे जिहाद के नाम पर किसी बे गुनाह का क़त्ल खुदा की इबादत नहीं है।

राम नाम की पवित्रता बचाने के लिए राम भक्तों को ही खड़ा होना होगा। इस से पहले कि राम के नाम पर रावण के कर्म की परिभाषा चढ़ा दी जाये जिस तरह खुदा के नाम पर शैतानी काम की चादर चढ़ाई गई थी, सनातन प्रेमियों को ही राम नाम की मर्यादा और पवित्रता बचानी होगी। जितनी देरी उतना नुकसान।

(अब्दुल मोईद अज़हरी)

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