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शाहीन बाग एक ऐसा कमरा बन चुका है जिसे देख कर ‘बिग बॉस’ की भी याद आती है और दुनिया के सबसे बड़े दार्शनिक ज्यां पाल सार्त्र के नाटक ‘नो एक्जिट’ और सेमुएल ब्रेख्त के प्रसिद्ध नाटक ‘वेटिंग फॉर गोडोट’ की भी याद आती है। बिग बॉस सीरियल में सभी पात्र आते तो हैं खुद को सबसे मासूम और सीधे साधे रुप में प्रस्तुत करने लेकिन जैसे जैसे दिन बीतते जाते हैं उनके अंदर का असली आदमी सामनेेे आने लगता है। उन सारे पात्रों के बीच फूट पड़ने लगती है। आपस में गुट बनने लगते हैं। लड़ाइयां शुरु हो जाती हैं। लेकिन सभी बिग बॉस की बात मानते हैं ।

ये बिग बॉस कहीं दूर से आदेश देता रहता है। लेकिन बिग बॉस को पूरे सीरियल में कोई देख नहीं पाता । सिर्फ उसकी आवाज़ के आधार पर लोग बिग बॉस की बात मानते हैं। बिग बॉस एक बंद कमरे में आदमी की असलियत को सामने लाने वाला गजब का खेल है जिसका मूल आप ज्यां पाल सार्त्र के नाटक नो एक्जिट से भी खोज सकते हैं। नो एक्जिट नाटक में तीन पात्र हैं। तीनों मर कर एक ऐसे लोक में पहुंचते हैं जिसे वो नरक समझते हैं। उन्हें एक सेवक एक कमरे में बंद कर देता है और कह देता है कि नरक में जल्दी ही उन्हें ट्रांसफर किया जाएगा।

तीनों नरक में जाने के लिए इंतजार कर रहे होते हैं। लगातार इंतजार करते करते आपस में तीनों नरक के बारे में बात करते हैं। उन्हें लगता है कि नरक में उन्हें जलाया जाएगा। उन्हें कांस्ट्रेशन कैंप की तरह बंद करके यातनाएं दी जाएंगी। लेकिन इंतजार लंबा होता जाता है । कोई नहीं आता । जिसके आने का वो इंतजार कर रहे हैं वो आता ही नहीं। धीरे धीरे उन तीनों को लगने लगता है कि नरक दरअसल यही है। कहीं जाना नहीं है। इस कमरे में धीरे धीरे तीनों के बीच लड़ाइयां शुरु होने लगती हैें।

तीनों एक दूसरे को देखना पसंद नहीं करते । फिर दो लोगों के बीच प्यार भी पनपने लगता है। लेेकिन तीसरा दोनों को पसंद नहीं करता है। धीरे धीरे इन तीनों को अहसास होने लगता है कि दरअसल यहां जो दूसरे लोग हैं उनका होना ही नरक है। सैमुएल ब्रेख्त ने एक कदम और आगे बढ़ कर वेटिंग फॉर गोडोट नाटक लिखा ।इसके दो पात्र हैं। दोनों किसी गोडोट के आने का इंतज़ार कर रहे हैं। आपस में दोनों बात करते रह जाते हैं । धीरे धीरे दोनों को लगने लगता है कि करने के लिए कुछ नहीं है। बोरियत के दौर में दोनों वो सब कुछ करते हैं जो दो इंतज़ार करने वाले लोग करते हैं। आपस में लड़ते हैं। धर्म पर बातें करते हैं।

पॉलिटिक्स पर बातें करते हैं। लेकिन दोनों इंतज़ार करते रहते हैं कि गोडोट आने वाला है। लेकिन गोडोट नहीं आता । शाहीन बाग के लोग पचास दिनों से बिग बॉस से घर में बंद हैं और किसी शाह या मोदी जैसे गोडोट के आने का इंतज़ार कर रहे हैं। बाग मे लड़ाइयां शुरु हो गई है। बाहर से लोग आकर इन्हें परेशान भी कर रहे हैं। इनके लिए दूसरे लोग नरक जैसे लगने लगे हैं।

धीरे धीरे इन्हें लगने लगा है कि करने के लिए कुछ नहीं हैं। लेकिन गोडोट है कि आने का नाम ही नहीं ले रहा । गोडोट के न आने का इंतजार और उससे पैदा हुई थकान धीरे धीरे शाहीन बाग को उस स्थिति में पहुंचा देगी कि वो समझ नहीं पाएंगे कि उन्हें करना क्या है क्योंकि धीरे धीरे उन्हें लगने लगेगा कि उन्होंने जो किया वो निरर्थक था और अब उनके पास करने के लिए कुछ नहीं हैं।

(अजीत कुमार मिश्रा)