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ज़रा सोचिए मौत से चंद लम्हे पहले की मुस्कान क्या कहती है, आप तो ज्ञानी है जिस इलाक़े के बारे में जानते ही नहीं वहां हत्यारों को पहचान लेते है,कानों में कुछ नाम आपको सुनाई देने लगते हैं तो जरूर आपको इस मुस्कान के मायने भी पता होंगे। जी उसी संत की मुस्कान जिसको भीड़ ने बेदर्दी से मार डाला, वहशी दरिंदों की वही भीड़ जिसके यहां सिर्फ दरिंदगी ही धर्म है।
पालघर की घटना पहली नहीं है जिसपर इतना शोर मच रहा है इससे पहले ऐसी ही वहशियों की भीड़ दादरी में भी थी जिसने अखलाक को मार दिया लेकिन तब चश्मा धर्म का आंखो पर था तो हत्यारे आपको हीरो लग रहे थे , मैं यूंही हीरो नहीं कह रहा आखिर सांसद जी हार माला पहनाकर स्वागत कर रहे थे ऐसे ही दरिंदगी के आरोपियों का , लिचिंग राष्ट्रधर्म बनाई जाने लगी और विडियो में पहलू खान के हत्यारे न्यायालय को दिखाई नहीं दिए ,मुझे न्यायालय की ईमानदारी पर कोई शक नहीं है लेकिन अब जो कुछ हुआ वह तो झुटलाया नहीं जा सकता।

सोनभद्र नरसंहार का भयानक मंज़र।

आइए मै आपको उस आखिरी वक़्त की हसी का मतलब समझा दूं शायद आप सहमत हो जाएं ,संत देख रहा था न्यू इंडिया के भविष्य को जो लोकतंत्र से भीडतंत्र की ओर अग्रसर है ऐसे में जीने से बेहतर है मर जाना,संत ने देखा यह जो बच्चे उसपर लाठियां बरसा रहे हैं यही न्यू इंडिया का भविष्य हैं ,इनके लिए किसी की भी जान लेना कोई बड़ी बात नहीं है यह हिंसक भेड़ियों का झुंड है मै शेर नहीं कह रहा क्योंकि शेर झुंड में हमला नहीं करते।

सियासत के हथियार यह दरिंदे खून के प्यासे और मौत के सौदागर हैं ,अगर यह नहीं थामे गए तो मोहब्बत एक इतिहास होगी और वर्तमान नफरत के नाम होगा जिसका भविष्य सिर्फ अंधकार होगा।लेकिन इसे कौन समझा सकता है यह वही भीड़ है जो किसी भी महिला के अपमान पर तर्क गढ़ती है और उसे जायज़ करार देती है,

मैं किसी दल का पक्षधर नहीं लेकिन भारत का वासी हूं यहां की परंपराओं और संस्कृति से जुड़ा हुआ हूं,यह वही भारत है जिसमें सन 1990 से पहले नारा जय सियाराम था जो सियासी हुआ तो जय श्रीराम हो गया ,इसी भारत में राधे राधे का जाप होता है और जय राधे कृष्ण कहा जाता है

न मंदिरों में राम की अकेली मूरत होती है न कृष्ण की मैं उसी भारत का वासी हूं लिहाज़ा किसी भी महिला के अपमान पर मुझे पीड़ा होती है मेरा सर शर्म से झुक जाता है। लेकिन ज़रा देखिए तो सही इसी भारत में न्यू इंडिया के अलंबरदार क्या कर रहे हैं ?महिला का अपमान करने वाले का समर्थन और महिला का चीरहरण ,चलिए यह आपकी राजनैतिक समझ है शायद इसी पर वह संत मुस्कुराया होगा?

आप गरीब के सवाल को मज़दूर की पीड़ा को किस तरह महिला के अपमान के तले दबा देने की कला में पारांगत हो चुके हैं यह भारत के लोग देख रहे हैं,अश्लील चित्रों के साथ भद्दे कमेंट यह आपकी कल्पनाओं का आइना हैं और आपकी परवरिश पर प्रश्नचिन्ह ,लेकिन आपको इसकी खबर नहीं क्योंकि आप अधर्म की अफीम चाट रहे हैं शायद आपकी हालत पर मुस्कुराया हो संत?
जब पूरी दुनिया महामारी से जूझ रही है तब देश में मेडिकल उपकरणों की खरीद में घोटाले कि खबरे आ रही है जब दुनिया वैक्सीन ढूंढ रही है हम सब्जी और फल बेचने वालों का मज़हब तलाश रहे हैं शायद रोटी का धर्म निर्धारित करने की किसी प्रक्रिया में लीन हैं शायद हमारी इसी बुद्धिमत्ता पर मुस्कुराया हो संत?
अमीरों को राहत उनके बच्चों को लाड प्यार और गरीब को विज्ञापन ऐसी पंगु व्यवस्था पर धार्मिक नफरत का पर्दा डालने वाले कारनामों पर शायद मुस्कुराया हो संत?

ज़रा सोचिए इस महामारी काल में हम बीमारी का धर्म टटोल रहे हैं जब तलाश करनी है कि कौन भूख से परेशान है उसे खाना पहुंचाना है तब किसी झूठ को सच साबित करने का प्रयास ताकि नफरत बढ़ जाए शायद इस पर ही मुस्कुराया हो संत?
वह एक संत था जिसे दरिंदो ने मार दिया ,वह संसार की मोहमाया से मुक्त था भेड़ियों ने जिसे नोच डाला वह देख रहा था बर्बाद होते हुए भारत को लेकिन उसकी आंखो को बंद कर दिया नफरत के पुजारियों ने,वह बोल सकता था कि जब हर जगह कटौती है तो सांसदों को निर्वाचन क्षेत्र भत्ते के नाम पर 49हज़ार रुपए प्रतिमाह क्यों ?

हो सकता है वह सवाल कर देता की गरीब को रोटी क्यों नहीं? पूछ सकता था अदालत की प्राथमिकता क्या है? झूठे निज़ाम से सवाल कर सकता था कि धर्म के नाम पर हिंसा क्यों?
वह संत था धर्म जानता था सवाल उठा सकता था कि माता सीता का जन्म तो नेपाल के जनकपुर में हुआ था हालांकि कुछ लोग बिहार के सीतामढ़ी में मानते हैं लेकिन जनकपुर का ज़िक्र खूब होता है तो बताईए आप उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम की अर्धांगिनी के तौर पर सम्मान देते हैं न ?क्योंकि स्त्री का देश और जाति उसके पति का देश और जाति ही होता है उसकी आखरी मुस्कान शायद आपके विवेक पर व्यंग्य थी?
और हां सुन लीजिए मैं यहां सोनिया गांधी को सीता और राधा से नहीं जोड़ रहा बस आपको याद दिला रहा हूं जो आप भूल गए हैं।ज़रा सोचिएगा क्या हम सब की मानसिक स्थिति पर हर सभ्य व्यक्ति को हंसी नहीं आती होगी ? जब देश का गरीब भूखा है मज़दूर असहाय है,घोटालेबाज ऐसे में भी बाज़ नहीं आ रहे हैं और नफरत के सौदागर हमें भी नफरत के खेल का शौकीन बना दे रहे हैं ऐसे में संत की आखरी मुस्कान समाज को गहरी नींद से जगाने के लिए ज़ोरदार तमाचा है।

यूनुस मोहानी