जानकर हैरानी होगी कि जिन मुसलमानों को भारत का नागरिक कहा जाता है और कभी-कभी देश का दुश्मन.उन्होंने सरकारों से कभी कोई मांग नही की.यह अपने आप मे नई बात हो सकती है क्योंकि देश मे रोज़ नई-नई तरह की मांगों को लेकर धरना प्रदर्शन होते है.कभी कोई आरक्षण मांगता है तो कोई सड़क,पानी,बिजली की मांग करता है.हालांकि यह सभी चीज़े बुनयादी ज़रूरियात है और इनकी मांग करना कानून कोई जुर्म भी नही है लेकिन यह मांगे भी भारत में बसने वाले मुसलमानों को छोड़कर सबने की.शायद ही कभी सुना हो कि मुसलमान आरक्षण की वजह से धरना प्रदर्शन कर रहे?
क्या कभी सुना कि महंगाई या किसी चीज़ की कमी को लेकर मुस्लिम समुदाय ने प्रदर्शन किया?
जबकि आरक्षण को लेकर गुर्जर,जाट,मराठा और न जाने कौन-कौन समय-समय मांग करते रहे है लेकिन मुस्लिम समाज ने कभी किसी आरक्षण की मांग नही की.यहां तक कि महंगाई की वजह से सड़कों पर आपने कई बार लोगों को प्रदर्शन करते देखा होगा.यह तब होता है जब दाल महंगी हो,सब्ज़ी महंगी हो या पेट्रोल एवं अन्य प्रयोग की जाने वाली वस्तुओं के दाम बढ़ने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो जाते है.कई बार इन्हें राजनीतिक समर्थन भी मिलता है और मुद्दा सड़क से संसद तक पहुंच जाता है लेकिन कभी सुना कि सबसे ज़्यादा मात्रा में हलाल मांस(मीट) खाने वाले मुसलमान कभी,मांस की कीमत के बढ़ने पर नाराज़,प्रदर्शन, विरोध करते नज़र आये हो?बता दें कि पिछले कुछ ही वर्षों में हलाल मीट की कीमत 60,70 रुपए से 200 रुपए के पार पहुंच चुकी है.उन्होंने इनके दामों में कमी की बात कभी नही की.यह इसलिए भी क्योंकि उनको शायद यह भरोसा है कि सरकार इसमें कटौती नही करेगी? और इस तरह से मुसलमान कभी न तो आरक्षण की मांग को लेकर सड़कों पर आए और न ही अपने प्रमुख खाने की बढ़ती मंहगाई की वजह से तो क्या मुसलमानों ने यह मान लिया है कि हमे तो मेहनत करके कामाना है और पेट भर के खाना है? या फिर मुसलमानों को देश में किसी से कोई दिक्कत ही नही है? और सारी दिक्कत देश में 80% लोगों की वजह से है.जो समय-समय पर देश की सरकार को घेरते रहते है.

अब इससे ज़्यादा और क्या सहयोग देशहित मे मुसलमानों को करना चाहिए?क्या मुसलमानों की बराबर देशहित में कोई और सोच सकता है?
इन सबके बावजूद मुसलमानों ने कुछ मांग ज़रूर की और वो ये कि, देश में अमन,शांति एवं भाईचारे की मांग.जिससे कि देश में सामाजिक ताने-बाने का बंधन सदैव बना रहे.उन्होंने हमेशा देश में या देश की सरहदों पर दहशतगर्दी की मुख़ालिफत की.इंसानियत के दुश्मनों का विरोध किया.
जबकि मुसलमानों से कुछ लोगों ने मताधिकार तक छिनने की मांग की और लगातार कर रहे है.इसके बदले में मुसलमानों ने जो मांग की वो राय भी हो सकती है और मांग भी. उन्होंने हमेशा देश की तमाम राजनीतिक पार्टियों से मांग कि के आप अपनी राजनीति के लिए देश की जनता को धर्म और जाति के नाम पर मत बांटों.तो यह मांग भी उन्होंने अपने लिए नही बल्की सामाजिक भाईचारे और देशहित में की.

(हसन हैदर)