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यह बुद्ध का देश है लेकिन आप बुद्ध की तरह आज़ादी से घूम कर शांति का सन्देश नहीं दे सकते। यह गाँधी का देश है लेकिन आप गाँधी की तरह अंतरात्मा की बात नहीं कर सकते। यह कबीर का देश है लेकिन आलोचना की आवाज के लिए यहाँ कोई जगह नहीं।

मनीष, प्रदीपिका, विकास, प्रियेश, मुरारी, अक्षय। ये नाम गाँधी, बुद्ध और कबीर के नाम से अलग नहीं हैं।

देश भर में फैलती नफरत की राजनीति से समाज को बचाने के लिए, 10 युवा यह निर्णय लेते हैं कि वे समाज में प्रेम और सद्भाव बढ़ाने के लिए गांधी के रास्ते पर चलेंगे। वे उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थल चौरीचौरा से गाँधी समाधि राजघाट दिल्ली तक पैदल मार्च के लिए निकल पड़ते हैं ताकि इस पूरी यात्रा के दौरान वे गाँव गाँव में प्रेम, शांति और सद्भाव का सन्देश पहुंचा सकें। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। क्यों ?

गाँधी के रास्ते पर चलने के लिए ?
समाज में प्रेम, शांति और सद्भाव की बात करने के लिए ?

अंग्रेजों के शासन में गाँधी चम्पारण जा सकते थे, खेड़ा जा सकते थे, लेकिन आप अपने देश की लोकतान्त्रिक सरकार में गाजीपुर नहीं जा सकते। चौरी चौरा से दिल्ली नहीं जा सकते ? और वो भी मात्र 10 लड़के जिनके हाथ में मात्र तिरंगा और कलम-किताबें हैं। क्या यह मान लिया जाए कि उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र की हत्या हो चुकी है। पूरा प्रशासन एक व्यक्ति की ज़िद्द का बंधक बना हुआ है। वे लोगों के हाथ में बंदूक पकड़ा सकते हैं लेकिन मुहब्बत को दो बात भी नागवार गुजरती है उनपर। एक व्यक्ति मंच से हत्या के नारे लगा सकता है, 100 लोगों का समूह एक महिला कॉलेज में घुसकर लड़कियों को प्रताड़ित कर सकता है लेकिन हम प्रेम और सामाजिक सौहार्द की बात नहीं कर सकते। हम गाँधी की बात नहीं कर सकते। हम गाँधी के देश में नहीं घूम सकते।

प्रदीपिका ने अपने पहले दिन के यात्रा वृतांत में लिखा है- ‘लोग पूछ रहे हैं कि इस यात्रा का उद्देश्य क्या है, आपकी मांग क्या है। जब हम उन्हें बताते हैं कि यह बस जागरूकता और सौहार्द बढ़ाने के लिए है तो वे हैरान कर रह जाते हैं। उनके चेहरे पर खुशी और हैरानी एक साथ दिखती है।”