(इसरार वारसी)

मैं क्या कर सकता हूं अगर वो मर गया। उस की मौत इसी तरह से लिखी थी। उस को मरना था और ऐसे ही मरना था। अल्लाह ने यही तय किया था के उस को यही मौत मिलनी है। ये तकदीर का लिखा है इसे कोई नहीं बदल सकता। मैं भी नहीं। क़ानून भी नहीं। संविधान भी नहीं। सवालों से उलझा दिमाग कभी धर्म के पास जाता है कभी क़ानून के पास तो कभी संविधान के पास। धर्म उस को अपने दायरे में आराम दे देता है और वो सो जाता है लेकिन जब उस की आंख खुलती है तो फिर वही दुख वही दर्द। जब दोबारा से दर्द उठता है तो कानून के पास जाता है जहां वो गलत सही पुलिस गवाह वकील अदालत जज के चक्कर में इस क़दर पिस जाता है के उस का दम घुटने लगता है। फिर उसे याद आती है संविधान की।

संविधान उस को राह दिखाता है उस की रहबरी करता है। संविधान दोबारा से उस में जान फूंकता है और उठा कर खड़ा करता है और ललकारता है के तुझे अपने हक की लड़ाई लड़नी होगी और इस लड़ाई में तुम्हारा सब से बड़ा हथियार मैं हूं। में संविधान हूं। मैं ही मुल्क हूं। क्यूं के मुझसे ही यहां के बाशिंदे हैं। मैं ने ही उन को अखंडता में एकता का पाठ पढ़ाया है। मैंने ही उन को हर तरह के भेद भाव से मुक्त किया है। मैंने ही औरत और मर्द को बराबर किया है। मैंने ही अमीर और गरीब दोनों को समान हक दिया है। मैंने ही धर्म और जाती के भेदभाव को खत्म किया है। मैंने ही अलग अलग भाषा बोलने वालों को बगैर किसी भेदभाव के एक माना है। मैंने ही उन को बगैर रंग भेद के अपनाया है। मैं भारत का संविधान हूं।

धर्म क़ानून और संविधान एक दूसरे से ऐसे मुंह बाए बैठे रहते हैं मानों सदियों पुरानी दुश्मनी हो इन की। धर्म जब क़ानून से टकराता है तो संविधान का सहारा लेता है और जब क़ानून धर्म से टकराता है तो वो भी संविधान का सहारा लेता है। पहले पहल धर्म संविधान और क़ानून से डरता है। वो धर्म के आधार पर भेद भाव करने से डरता है। वो डरता है मुल्क के बाशिंदों को जातियों में बांटने से। वो डरता है किसी औरत को उस के पति के साथ जल कर मर जाने को कहने से। वो डरता है धर्म के नाम पर ज़ुल्म करने से। फिर धीरे धीरे क़ानून धर्म का साथ देने लगता है।

क़ानून धर्म के नाइंसाफियों को नज़र अंदाज़ करना शुरू करता है हत्ता के धर्म को संविधान से बचाने में लग जाता है और संविधान को कमज़ोर करने लग जाता है। एक वक़्त ऐसा आता है के क़ानून धर्म के मातहत हो जाता है और धर्म और संविधान आमने सामने खड़े हो जाते हैं और धर्म संविधान को चुनौती देने लगता है। लोकतंत्र के लिए सब से स्वर्णिम युग वो होता है जब क़ानून संविधान के मातहत काम करता है और धर्म उस के मानने वालों तक ही सीमित रहता है और सड़कों पर नहीं आता। लोकतंत्र का काला युग वो होता है जब धर्म संविधान को चुनौती देने लगता है और संविधान बौना नज़र आने लगता है।

लेकिन ऐसा अनायास नहीं होता। इस के पीछे बड़ी सोची समझी साजिश काम करती है। साजिश संविधान को खत्म करने से पहले धर्म को हथियार बनाने की। साजिश एक हिंसक समाज बनाने की जो अपनी सोचने समझने की ताकत खो चुकी हो। साजिश एक ऐसा समाज बनाने की जहां सवाल ना किए जाएं। साजिश एक ऐसा समाज बनाने की जहां हर कोई डर के माहौल में जिए और इस समाज का इस्तमाल जिस तरह चाहे किया जा सके। यही समाज बाजारवाद को बढ़ावा देता है। यही समाज निजीकरण को अच्छा कहता है। यही समाज नीतियों के बजाए नागरिक को कोसता है।

यही समाज सरकार को ही मुल्क मान लेता है और राजनेता को अवतार और ये तर्क देता है के प्रजा का फ़र्ज़ है के राजा के साथ खड़ा रहे। जिस वक़्त ये तर्क संविधान के कानों में पड़ता है संविधान रो पड़ता है। लोकतंत्र में कोई राजा और कोई प्रजा नहीं होता है। लेकिन ये उस समाज की उपज है जिसे बड़ी साजिशों के तहत तैयार किया गया है। यही समाज संसाधनों की अंधी लूट को विकास की संज्ञा देता है और प्रकृति की बरबादी और ग्लोबल वार्मिंग को नकारता है। ये सब होता रहता है और संविधान देखता रहता है क्यूं के धर्म अब संविधान के सामने खड़ा उस को चुनौती दे रहा है।

ये समाज यहीं नहीं थकता यहीं नहीं रुकता है। वो तो समाज को बांटने की जो चरम स्तिथि होती है वहां तक पहुंचता है। वो लोगों को मारना शुरू करता है धर्म के नाम पर देशभक्ति राष्ट्रवाद के नाम पर। वही राष्ट्रवाद जो देश की कोख से जन्म लेने के बाद सब से पहले उसी को मारता है। वही राष्ट्रवाद जो इंसानों से मिल कर बनने वाला देश को इंसानों के ऊपर रख देता है और उस के बुनियादी हक को भी राष्ट्रवाद के अधीन कर देता है। वही राष्ट्रवाद जो इंसान की वकत छीन कर उस को बाज़ार का उपभोक्ता बना देता है। और ये बड़ी आसानी से हो जाता है क्यूं के धर्म संविधान के सामने खड़ा उस को चुनौती दे रहा है। इसी मारने की कड़ी में वो किसी को धर्म के नाम पर मारता है तो किसी को जाती के नाम पर। कभी किसी जानवर के नाम पर तो कभी किसी मिथक के नाम पर।

ये समाज हर किसी को मार देने की ताकत रखता है क्यूं के क़ानून ने धर्म को अधर्म से रोकने के बजाए उस को नज़र अंदाज़ किया और खुद उसी धर्म के मातहत हो गए जहां धर्म सीना ताने संविधान के सामने खड़ा हो गया और उस को चुनौती देने लगा। यही समाज मारने के लिए इतना आतुर हो जाता है के इंसान के नाम में उस की पहचान ढूंडने लगता है। क़ानून का काम ये समाज करने लगता है क्यूं के क़ानून ने पहले ही धर्म के आगे हार मान ली है। क़ानून दोषियों को सज़ा देने के बजाए उन को बचाने में लग जाता है। रफ्ता रफ्ता ये कहानी बढ़ते बढ़ते एक हिटलर को जन्म देती है जो पूरे समाज पूरे मुल्क को वहशी बना देता है और मुल्क को गृह युद्ध में झोंक देता है। जब हमारी आंख खुलती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है क्यों के तब तक हम इंसानियत का क़त्ल के चुके होते हैं। आंख खुलती है तब हमें पता चलता है के हम ने राष्ट्रवाद को कितना गलत समझा था और इस का असल मकसद क्या था।

झारखंड के सरायकेला में एक नौजवान को भीड़ ने बिजली के पोल से बांध के पीटा और एक धर्म विशेष का नारा लगवाया क्यूं की उस के नाम से ये पता चल रहा था के वो दूसरे धर्म विशेष का है। उस पर इल्ज़ाम था चोरी का। चोर को चोरी की सज़ा किसे देनी चाहिए? उस की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए? जवाब बहुत सीधा आसान सा है। क़ानून को उस को गिरफ्तार करना चाहिए उस पर मुकद्दमा चलानी चाहिए और सज़ा देनी चाहिए। लेकिन हुआ क्या। भीड़ ने क़ानून का आधा अधूरा काम किया उस पर बगैर मुकद्दमा चलाए उस को अपराधी घोषित कर दिया और मौत की सज़ा सुना दी। उस की सब से बड़ी गलती ये थी के वो उस धर्म को मानने वाला था जिस की पहचान आधुनिक भारत में राष्ट्रवाद के दुश्मन के तौर पर की जाती है। इस की भी एक ऐतिहासिक वजह है।

राष्ट्रवादियों का मानना है के जिस की जन्म भूमि और पुण्य भूमि दोनों भारतीय नहीं हैं वो दूसरे दर्जे के नागरिक हैं और राष्ट्रवाद के दुश्मन हैं और उन को मारा जा सकता है। उन की औरतों बच्चियों का बलात्कार किया का सकता है और उन को अपने ही घर से भगाया का सकता है। और इन सब की मिसालें मौजूद हैं। कठुआ, मेरठ, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, गुजरात और अब झारखंड। इस धारणा का जन्म उसी धर्म की कोख से हुआ जो कभी क़ानून से डरता था लेकिन क़ानून ने उन का साथ दिया और क़ानून भी राष्ट्रवादी बन बैठा। यही वो हालात हैं जो संविधान को मुंह चिढ़ाते हैं और चुनौती देते हैं।

संविधान के द्वारा दिए गए मूलभूत अधिकारों में सब से बड़ा और पहला अधिकार है जीने का जो मुल्क के नागरिक से कोई नहीं छीन सकता हत्ता के हम ने मिसालें देखी हैं के कोर्ट ने इच्छा मृत्यु की अर्जियों को कई बार ख़ारिज किया है। फिर एक सर फिरा भीड़ कैसे किसी से जीने का हक छीन सकता है। ये भीड़ उसी साजिश का हिस्सा है जिस के तहत क़ानून को पंगु बना दिया गया और संविधान को कमज़ोर कर दिया गया।

अब सवाल ये है के क्या कभी मुल्क का भरोसा संविधान पर लौट पाएगा? क्या कभी क़ानून धर्म के चंगुल से खुद को आज़ाद कर पाएगा? क्या धर्म वापस घरों तक सिमट पाएगा और सड़कें धर्म के शोर से आज़ाद हो पाएंगी? या फिर हम किसी हिटलर के पैदा होने का इंतजार कर रहे हैं या कोई हिटलर पैदा हो चुका है और हम गृह युद्ध का इंतज़ार कर रहे हैं? समाज के हालात को देख कर लगता है के हां हिटलर तो पैदा हो चुका है और हम गृह युद्ध का इंतज़ार कर रहे हैं। और अगर जल्द ही संविधान ने खुद को मज़बूत और क़ानून को अपने मातहत नहीं किया तो इसी तरह संविधान के सामने कई तब्रेज़ मरते रहेंगे, क़ानून उन को बचाता रहेगा और धर्म हंसता रहेगा समाज और हिंसक होता जाएगा हिटलर खुश होगा और बाजारवाद निजीकरण फलते फूलते रहेंगे और एक दिन ना संविधान बचेगा और ना मुल्क।

 

नोट: लेखक इसरार वारसी के अपने निजी विचार हैं इसका नया सवेरा से कोई संबंध नहीं है