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उद्योगपति और सरकार के गठजोड़ वाले क्रोनी – कैपलिज्म का इससे परफेक्ट क्लासिक केस नहीं देखा होगा-

“मैं इस तरह से क्रोधित नहीं होता, लेकिन सोचने पर मजबूर हो गया हूँ ऐसे सिस्टम और देश में कैसे काम करूँ? बेहतर होगा कि इस देश में रहा ही न जाए. देश को छोड़ देना चहिए”

ऊपर के शब्द किसी नेता के नहीं हैं, अमीर खान या जावेद अख़्तर के भी नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरुण मिश्रा के हैं. इस मामले के बाद सुप्रीम कोर्ट की हालत सड़क पर खड़ी निरीह गाय जैसी हो गई है. टेलीकॉम से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते समय कल सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल(सरकारी प्रतिनिधि) से कहा-
“क्या देश में कानून नाम की कोई चीज बची है? इस देश में सुप्रीम कोर्ट का कोई महत्व बचा है? क्या हम सुप्रीम कोर्ट बन्द कर दें?

मामला ये है कि अम्बानी की कंपनी रिलायंस जियो पर 45,000 करोड़ रुपए का रैवेन्यू बाकी है. इसके अलावा अन्य टेलीकॉम कंपनियों का रैवेन्यू भी शामिल कर लें तो कॉर्पोरेट की केवल 4 कम्पनियों पर कुल 1.47 लाख करोड़ रुपए का रेवेन्यू बाकी है. जिसमें वोडाफोन- आइडिया, एयरटेल और टाटा कम्पनियां शामिल हैं. आपका थोड़ा काम बढ़ा रहा हूँ… एक बार दोबारा पढ़िए “1.47 लाख करोड़!”…. I repeat… “लाख करोड़”…

मतलब समझते हैं?

ये सब पैसा किसके पास गया? कहां समा गया? यदि कम्पनियों ने सरकार को ये पैसे जमा नहीं किए तो किसकी जेब में गया? दरअसल कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने इन कम्पनियों को आदेश दिया था कि तयशुदा तारीख तक चुपचाप रैवेन्यू सरकारी कोष में जमा करवा दें अन्यथा आगे कार्यवाही करनी पड़ेगी. लेकिन इन कम्पनियों में से किसी भी कम्पनी ने तय तारीख तक सभी पैसा जमा करवाने की बात छोड़िए, एक चवन्नी तक जमा न की.

इसके पीछे कम्पनियों और सरकार ने एक साजिश करी. एक सरकारी डेस्क अधिकारी ने एक आदेश पारित करके सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी. सरकारी अधिकारी ने आदेश दिया कि “वह कम्पनियों पर पैसे जमा करने के लिए दबाव नहीं बनाएंगे और न उनपर आगे कोई कार्यवाही होगी…..”

क्या आपने आजतक सुना है सुप्रीम कोर्ट के आदेश को किसी सरकारी अधिकारी ने अपना आदेश देकर निरस्त कर दिया हो? अब तक तो यही सुना जाता था कि इस देश में सबसे ऊपर न्यायपालिका है, सुप्रीम कोर्ट है. इसलिए जिस किसी आदेश पर कभी रोक लगाई जाती थी तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही लगाई जाती थी. लेकिन अब समय बदल गया है, नरेंद्र मोदी के अधिकारी अपने आप में न्यायाधीश हो गए हैं. अब सुप्रीम कोर्ट, अधिकरियों के फैसलों पर रोक नहीं लगाता. बल्कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर सरकारी अधिकारी रोक लगाने लग गए हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी प्रतिनिधि यानी सॉलिसिटर जनरल से कहा है-
” क्या सुप्रीम कोर्ट का कोई महत्व नहीं है क्या? यह सब पैसे के बल पर हो रहा है, अब तक इन कम्पनियों ने एक पैसे का भुगतान नहीं किया है, और एक डेस्क अधिकारी ने दुस्साहस करते हुए अदालत के आदेश पर रोक लगा दी है. सरकार ने उस अधिकारी के खिलाफ क्या कार्यवाही की? यह बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.”

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा है- “जिस तरह से चीजें हो रही हैं, इससे हमारी अंतरात्मा हिल गई है, हम इस तरीके से काम नहीं कर सकते, आखिर इन सभी को कौन प्रायोजित कर रहा है? ”

पूरे मामले पर आगे जस्टिस मिश्रा ने कहते हैं-
“हमें नहीं पता कि व्यर्थ की बातें कौन कर रहा है? मैं वाकई दुखी हूं, मैं ऐसा महसूस करता हूँ कि मुझे इस अदालत और इस तरह के सिस्टम में काम नहीं करना चाहिए!”

जस्टिस मिश्रा और इसी बैंच के बाकी जजों जस्टिस अब्दुल नजीर और जस्टिस सुभाष रेड्डी की बातें आपको सामान्य लग सकती हैं. लेकिन ये पूरा मामला कॉरपोरेट और नेताओं के गठजोड़ को नंगा करने वाला है. इसे अंग्रेजी में क्रोनी-कैपलिज्म कहते हैं. जिसमें नेता पूंजीपति- उद्योगपति की मदद करता है, उद्योगपति-पूंजीपति नेता की मदद करते हैं, नेता को चुनाव जितवाने में मदद करते हैं.

सोचिए जिस पैसे को अम्बानी और टाटा की कम्पनी कहीं दबा गईं, उस रेवेन्यू से कितने स्कूल खड़े होते, कितने अस्पताल खड़े होते? लेकिन अब वह पैसा कहां गया?

आपको पता चला? ये बड़ी बड़ी कंपनियां, अम्बानी- अडानी, टाटा, राजनीतिक पार्टियों के बांड क्यों खरीदते हैं? क्यों उन्हें चुनावी फंड देते हैं?

नेता आपको हिन्दू-मुसलमान करके चुनाव जीतता है, आपके ऊपर शासन करता है. इसके लिए उद्योगपति बड़ा बड़ा पैसा लगाते हैं. नेता अपनी गद्दी बचाए रखने के लिए पूंजीपति की मदद करता है. आप हिन्दू-मुसलमान में बिजी रहते हैं। आपके बच्चों के स्कूलों का पैसा, आपके अस्पतालों का पैसा उद्योगपति के एकाउंट बैलेंस की जीरो बढ़ाने के काम आता है. एक बार फिर याद करिए…

1.47 लाख-करोड़…. I repeat,….”लाख करोड़”..

~ Shyam Meera Singh